देवी देवताओं को सजा देने की अनोखी आदिवासी परंपरा, यहां गलती की नहीं मिलती माफी

धमतरी : छत्तीसगढ़ में आदिवासी परंपरा और रीति रिवाज अपने अंदर कई तरह के रहस्य छिपाए हुए हैं,आज भी हमारे बीच आदिवासी समाज कई तरह के परंपराओं का निर्वहन करता है.जिस पर यकीन कर पाना मुश्किल है.फिर भी इनकी परंपराओं के प्रति लोगों का विश्वास आज भी अडिग है. ऐसी ही एक परंपरा धमतरी जिले के वनांचल क्षेत्र में निभाई गई.
गलती की तो मिलेगी सजा : हम बचपन में यदि गलती करते थे, तो हमें सजा मिलती थी.कोई ना कोई जो घर में बड़ा होता था हमें गलतियों पर जरुर टोकता था. माता पिता तो कई बार बच्चों को गलती दोबारा ना करें इसलिए सजा दिया करते थे.गलती पर सजा देने का कल्चर कॉर्पोरेट से लेकर गवर्मेंट सेक्टर तक में है.लेकिन क्या कभी आपने सुना है कि देवी देवताओं को गलती की सजा दी जाए.आप कहेंगे ऐसा नहीं हो सकता.लेकिन छत्तीसगढ़ में गलती करने पर देवी देवता भी नहीं बचते,इन्हें भी सजा मिलती है आईए जानते हैं कैसे.
भंगाराव माई की जात्रा की मान्यता : छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के कुर्सीघाट बोराई में हर साल भादो माह के नियत तिथि पर भंगाराव माई की जात्रा होती है. जिसमें बस्तर और ओडिशा सहित सिहावा क्षेत्र के देवी देवता शिरकत करते हैं. सदियों से चल आ रही है इस अनोखी प्रथा और न्याय के दरबार का साक्षी बनने हजारों की तादाद में लोग पहुंचते हैं. इस बार भी ये प्रथा निभाई गई. जिसमें कांकेर लोकसभा के सांसद भोजराज नाग,पूर्व विधायक श्रवण मरकाम सहित क्षेत्र के कई जनप्रतिनिधि शामिल हुए. इसमें इलाके के सभी वर्ग और समुदाय के लोगों की आस्था जुड़ी है. कुवरपाट और डाकदार की अगुवाई में यह जात्रा पूरे विधि विधान के साथ संपन्न होती है.
भंगाराव माई के दरबार में पेशी : कुर्सीघाट में सदियों पुराना भंगाराव माई का दरबार है. इसे देवी देवताओं के न्यायालय के रूप में जाना जाता है.ऐसा माना जाता है कि भंगाराव माई की मान्यता के बिना क्षेत्र में कोई भी देवी देवता कार्य नहीं कर सकता है. मान्यता है कि आस्था और विश्वास के चलते जिन देवी देवताओं की लोग उपासना करते हैं लेकिन वो देवी देवता अपने कर्तव्य का निर्वहन ना करे तो उन्हें शिकायत के आधार पर भंगाराव माई सजा देते हैं.वहीं इस विशेष न्यायालय स्थल पर महिलाओं का आना प्रतिबंधित है.
न्याय के कठघरे में खड़े होते हैं देवी देवता : सुनवाई के दौरान देवी देवता एक कठघरे में खड़े होते हैं, यहां भंगाराव माई न्यायाधीश के रूप में विराजमान होते हैं. सुनवाई के बाद यहां अपराधी को दंड और वादी को इंसाफ मिलता है.गांव में होने वाली किसी प्रकार की कष्ट,परेशानी को दूर ना कर पाने की स्थिति में गांव में स्थापित देवी-देवताओं को ही दोषी माना जाता है.
कैसे दी जाती है सजा ?: भंगाराव माई की उपस्थिति में जातरा में पहुंचे देवी-देवताओं की एक-एक कर परीक्षा होती है. इस दौरान जो देवी देवता इस परीक्षा में फेल होते हैं उनके सामग्रियों को गड्ढे में फेंक दिया जाता है,जिसे ग्रामीण कारागार कहते हैं. पूजा अर्चना के बाद देवी देवताओं पर लगने वाले आरोपों की गंभीरता से सुनवाई होती है.आरोपी पक्ष की ओर से दलील पेश करने सिरहा, पुजारी, गायता, माझी, पटेल सहित ग्राम के प्रमुख उपस्थित होते हैं. दोनों पक्षों की गंभीरता से सुनवाई के बाद आरोप सिद्ध होने पर फैसला सुनाया जाता है. मान्यता है कि दोषी पाए जाने पर इसी तरह से देवी-देवताओं को सजा दी जाती है.





