February 11, 2026 10:27 am
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न दुबई, न चीन…इस सीक्रेट जगह पर छिपे हैं नेपाल के पूर्व पीएम केपी शर्मा ओली

नेपाल में बीते कुछ दिनों से हालात काफी उग्र बने हुए हैं. युवाओं के प्रदर्शन ने सिर्फ दो दिन में ही सत्ता की नींव हिला दी. दबाव इतना बढ़ा कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा. इस्तीफे के बाद तरह-तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं. कोई कह रहा था कि ओली दुबई चले गए हैं, तो कोई यह दावा कर रहा था कि वे चीन में हैं.

लेकिन अब खुद केपी शर्मा ओली ने इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए साफ किया है कि वे न दुबई गए हैं, न चीन, बल्कि फिलहाल शिवपुरी में नेपाली सेना के सुरक्षा घेरे में रह रहे हैं. ओली ने फेसबुक पर एक खुला पत्र साझा किया है, जिसमें उन्होंने जनता और खासकर युवाओं को संबोधित किया. पत्र में उन्होंने लिखा कि वे सेना के जवानों के बीच सुरक्षित हैं और इस सन्नाटे में भी बच्चों और युवाओं को याद कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें बच्चों की मासूम हंसी और स्नेह हमेशा रोमांचित करता है.

आंदोलन को गहरी साजिश बताया

पत्र में ओली ने अपनी निजी पीड़ा का भी ज़िक्र किया. उन्होंने लिखा कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के दौरान सत्ता की यातनाओं के कारण वे अपने संतान से वंचित रह गए. लेकिन पिता बनने की चाह कभी खत्म नहीं हुई. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 1994 में जब वे गृहमंत्री थे, तब उनके कार्यकाल में सरकार की ओर से एक भी गोली नहीं चली.

ओली ने मौजूदा आन्दोलन को युवाओं की सच्ची आवाज़ नहीं, बल्कि एक गहरी साजिश करार दिया. उनके अनुसार सरकारी दफ़्तरों में आगजनी, जेल से कैदियों की रिहाई जैसे कदम किसी मासूम प्रदर्शन का हिस्सा नहीं हो सकते. उन्होंने चेताया कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को संघर्ष और बलिदान से हासिल किया गया है, आज उसी को खत्म करने की कोशिश हो रही है.

अपने कई फैसलों का जिक्र किया

अपने स्वभाव को जिद्दी बताते हुए ओली ने लिखा कि अगर वे अडिग न रहते तो अब तक हार मान चुके होते. उन्होंने सोशल मीडिया कंपनियों पर नियम लागू करने से लेकर लिपुलेक, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताने तक कई फैसलों को अपनी जिद का नतीजा बताया. यहां तक कि भगवान श्रीराम का जन्म नेपाल में हुआ था, यह भी उन्होंने जिद करके कहा. पत्र के अंत में ओली ने साफ किया कि उनके लिए पद और प्रतिष्ठा से ज़्यादा महत्वपूर्ण देश की व्यवस्था है. यही व्यवस्था लोगों को बोलने, चलने और सवाल करने का अधिकार देती है और इसे बचाना ही उनका जीवन उद्देश्य है.

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