प्रतिमाओं के लिए फेमस दुर्ग जिले का थनौद गांव, यहां वेश्यालय से लाई मिट्टी से बनती है मूर्ति, जानिए खासियत

दुर्ग: जिले का थनौद गांव भगवान की प्रतिमाओं को बनाने के लिए फेमस है. यहां की बनी प्रतिमाएं छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के कई राज्यों तक जाती हैं. दुर्गा उत्सव के लिए भी इसकी तैयारी तेज कर दी गई है. हालांकि इसकी तैयारी की शुरुआत महीनों पहले ही शुरू हो जाती है.
कहां है ये गांव?: थनौद गांव भिलाई से करीब 22 किलोमीटर दूर है. इसे मूर्तियों का गांव कहा जाता है. 10 हजार की बस्ती में 70 घर कुम्हार के हैं और 60 घर के लोग तो पीढ़ियों से प्रतिमा बना रहे हैं. यहां हर साल 5 हजार से अधिक प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं. मूर्तिकला का ज्ञान उन्हें अपने पुरखों से मिला है और अब आने वाली पीढ़ी भी परंपरा को आगे बढ़ा रही है. मूर्तिकार राधेश्याम के मुताबिक, मूर्तियों का निर्माण केवल कला नहीं बल्कि श्रद्धा और आस्था का संगम है.
जैसे मां बच्चे को 9 महीने गर्भ में रखती है और उसके बाद फिर बच्चे का बाकी परिवार भी ध्यान देता है वैसे ही हम मूर्तियों को बनाते हैं. उसके स्ट्रक्चर से लेकर उसमें रंग भरने तक सब चीज का ख्याल रखना होता है– राधेश्याम चक्रधारी, मूर्तिकार
दूसरे राज्यों तक जाती है मूर्तियां: यहां बनी मूर्तियों की गूंज सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही नहीं, बल्कि देश के कई राज्यों में सुनाई देती है. महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे प्रदेशों तक थनौद की मूर्तियां पहुंचती हैं. मूर्तियों की कीमत 50 हजार रुपए से लेकर 2 लाख रुपए तक होती है. मूर्तिकार बताते हैं कि अलग-अलग राज्यों में इन मूर्तियों की कीमत और भी ज्यादा मिलती है, क्योंकि उनकी खासियत ही उन्हें अद्वितीय बनाती है.
अब जानिए मिट्टी के इस्तेमाल की कहानी: सबसे खास बात यह है कि दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए कारीगर मिट्टी विशेष स्थान वेश्यालय से लाते हैं. यह वेश्याओं के आंगन से ली जाती है और इसे सबसे पवित्र मिट्टी माना जाता है. मान्यता है कि मां दुर्गा ने स्वयं वेश्याओं को वरदान दिया था कि उनकी मूर्ति के निर्माण में उनकी मिट्टी का इस्तेमाल होने से ही मूर्ति पूर्ण होगी. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और माना जाता है कि इस मिट्टी से बनी मूर्ति में ही प्राण प्रतिष्ठा संभव है.
नवरात्रि की आहट के साथ ही थनौद गांव की गलियां रंग-बिरंगी प्रतिमाओं से भर उठती हैं. मिट्टी की खुशबू, रंगों की बौछार और हथौड़े की थाप मिलकर इस गांव को आध्यात्मिक धाम बना देती है. यहां सिर्फ मूर्तियां नहीं बनतीं, बल्कि हर घर में आस्था गढ़ी जाती है और भक्ति जन्म लेती है. वाकई ऐसे गांव और ऐसे कलाकार सिर्फ मूर्तियों में ही नहीं बल्कि भारत के उत्सवों में भी कई रंग भर देते हैं.





