मां गंगा मैया शक्तिपीठ : केवट के जाल में फंसी थी प्रतिमा, नवरात्रि में उमड़ी भक्तों की भीड़

बालोद : शारदीय नवरात्रि के पहले दिन बालोद के प्रसिद्ध मां गंगा मैया शक्तिपीठ में भक्तों की भीड़ उमड़ी. नवरात्रि पर्व के मौके पर मंदिर में 1270 घी और तेल के दीपक सामूहिक तौर पर प्रज्जवलित की गई. इस अवसर पर पूरे दिन सेवा जस गीतों की गूंज रही. श्रद्धालु मां गंगा मैया की आराधना में शामिल हुए.
सुरक्षा व्यवस्था हुई कड़ी : ASP मोनिका ठाकुर ने मंदिर परिसर का निरीक्षण करते हुए बताया कि गंगा मैया मंदिर सहित जिले के सभी प्रमुख स्थलों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है. पेट्रोलिंग पार्टी तैनात हैं और महिला श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए विशेष महिला पुलिस बल की नियुक्ति अलग-अलग स्थानों पर की गई है.प्रशासन ने सुरक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित करने का दावा किया है.
कैसे पड़ा मां गंगा मैया धाम का नाम : आपको बता दें कि बालोद का ये मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रसिद्ध केंद्र है. यहां केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश-विदेश से भी श्रद्धालु दीप प्रज्वलन और दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में जब तांदुला नहर का निर्माण कार्य चल रहा था, तब जल से माता की प्रतिमा प्रकट हुई थी.इसी कारण इस शक्ति पीठ को गंगा मैया नाम दिया गया.
भक्तों की सुविधा का ध्यान : मंदिर समिति के सदस्य छन्नू साहू ने बताया कि प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार भी भक्तों की सुविधा एवं सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया है.
दूर से आने वाले भक्तों के लिए न्यूनतम दर पर पूड़ी सब्जी और भोजन की व्यवस्था की जा रही है. वहीं दूसरी तरफ भक्तों के पैर धोने के लिए ऑटोमेटिक व्यवस्था के रूप में यहां पर हमेशा की जाती है. वहीं अन्य कई सारी ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिससे भक्तों को कोई समस्या ना हो- छन्नू साहू, सदस्य, मंदिर समिति
135 साल पुराना है मंदिर का इतिहास: स्थानीय लोगों की मानें तो झलमला स्थित मां गंगा मैया मंदिर की स्थापना का इतिहास अंग्रेजी शासन काल से जुड़ा हुआ है. लगभग 135 साल पहले जिले की जीवन दायिनी तांदुला नदी पर नहर का निर्माण चल रहा था. सोमवार को वहां बड़ा साप्ताहिक बाजार लगता था. बाजार में दूर-दराज से पशुओं के झुंड के साथ बंजारे आया करते थे. पशुओं की संख्या अधिक होने की वजह से पानी की कमी महसूस होती थी. पानी की कमी को दूर करने के लिए बांधा तालाब की खुदाई कराई गई. गंगा मैया की कहानी इसी तालाब से शुरू होती है.
जाल में फंसी थी प्रतिमा: मंदिर के व्यवस्थापकों के मुताबिक एक दिन सिवनी गांल का एक केवट मछली पकड़ने के लिए इस तालाब में गया. जाल में मछली की जगह एक पत्थर की प्रतिमा फंस गई. केवट ने अज्ञानतावश उसे साधारण पत्थर समझ कर फिर से तालाब में डाल दिया. लेकिन अगली बार जाल में फिर वहीं प्रतिमा फंस गई. केवट ने फिर मूर्ति को तालाब में डाल दिया. लेकिन जितने बार भी केंवट जाल को तालाब में डालता,वो प्रतिमा उतनी ही बार जाल में फंसती.आखिरकार केवट ने जाल से मूर्ति को निकालकर फिर से तालाब में फेंका और घर चला गया.
केवट को आया सपना: इसके बाद मां गंगा देवी ने गांव के गोंड़ जाति के बैगा को स्वप्न में आकर कहा कि मैं जल के अंदर पड़ी हूं. मुझे जल से निकालकर मेरी प्राण-प्रतिष्ठा करवाओ. स्वप्न की सत्यता को जानने के लिए तत्कालीन मालगुजार छवि प्रसाद तिवारी, केवट और गांव के अन्य प्रमुखों को साथ लेकर बैगा तालाब पहुंचा. केवट ने फिर जाल फेंका, जिसमें वही प्रतिमा फिर फंसी. इसके बाद प्रतिमा को बाहर निकाला गया. इसके बाद देवी के आदेशानुसार छवि प्रसाद ने अपने संरक्षण में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई. जल से प्रतिमा के निकलने की वजह से यह धाम मां गंगा मैया के नाम से विख्यात हुई.





