February 25, 2026 1:56 am
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छत्तीसगढ़

निको प्रबंधन पर सौतेला व्यवहार का आरोप, ग्रामीण परिवहन संघ का हंगामा

नारायणपुर: जिले के ग्राम छोटे डोंगर में बुधवार दोपहर बड़ा हंगामा देखने को मिला, जब नवगठित ग्रामीण परिवहन संघ के सैकड़ों सदस्य जायसवाल निको प्रबंधन के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए उसके क्षेत्रीय कार्यालय के बाहर प्रदर्शन पर उतरे. ग्रामीण परिवहन संघ का आरोप है कि लौह अयस्क परिवहन में उन्हें हाशिए पर रखा जा रहा है और उनकी गाड़ियों को लोडिंग नहीं दी जा रही. संघ के पदाधिकारियों ने इसे स्पष्ट रूप से सौतेला व्यवहार करार देते हुए कंपनी को तीन दिन का अल्टीमेटम दिया है.

खनन और परिवहन का पृष्ठभूमि: नारायणपुर जिले का छोटेडोंगर इलाका लौह अयस्क खनन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है. यहां स्थित आमदाई माइंस से रोजाना सैकड़ों टन लौह अयस्क का उत्पादन और परिवहन किया जाता है. खनन गतिविधियों को गति देने के लिए परिवहन कंपनियों और स्थानीय ट्रांसपोर्ट यूनियनों की अहम भूमिका होती है. लंबे समय से यहां लौह अयस्क परिवहन का जिम्मा एक निजी ट्रांसपोर्टर कंपनी और मालक परिवहन संघ संयुक्त रूप से संभाल रहे हैं.

इसी व्यवस्था के अंतर्गत जिले के कई स्थानीय वाहन मालिक भी अपने ट्रक लगाकर परिवहन कार्य से जुड़े हुए हैं. लेकिन सभी को समान अवसर न मिलने की शिकायतें समय-समय पर उठती रही हैं.

ग्रामीणों का नया संघ: स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि मालक परिवहन संघ में मनमानी और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया जाता है. इसी असंतोष को देखते हुए ग्रामीणों ने सभी नियम-कायदों का पालन करते हुए नया संगठन खड़ा किया और उसका नाम रखा ग्रामीण परिवहन संघ.
ग्रामीण परिवहन संघ का कहना है कि उन्होंने पंजीयन की प्रक्रिया पूरी की और कंपनी प्रबंधन से कई दौर की चर्चा भी की. शुरुआती स्तर पर जायसवाल निको के अधिकारियों ने लोडिंग उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था. लेकिन अब जब वाहनों की वास्तविक तैनाती की बात आती है, तो प्रबंधन अपने वादे से मुकर रहा है.

प्रबंधन पर सौतेले व्यवहार का आरोप: ग्रामीण परिवहन संघ के सदस्यों का आरोप है कि जायसवाल निको प्रबंधन सिर्फ पुराने मालक परिवहन संघ को ही मान्यता दे रहा है और नए संघ की अनदेखी कर रहा है. ग्रामीणों के अनुसार, जब उन्होंने इस फैसले को लिखित में देने की मांग की, तो प्रबंधन ने कोई जवाब नहीं दिया और चुप्पी साध ली. संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यह न केवल ग्रामीणों के अधिकारों का हनन है, बल्कि स्थानीय निवासियों को रोजगार से वंचित करने की साजिश भी है.

प्रदर्शन और नारेबाजी:

1 अक्टूबर की दोपहर करीब दो बजे सैकड़ों ग्रामीण छोटे डोंगर स्थित जायसवाल निको के क्षेत्रीय कार्यालय पहुंचे. यहां उन्होंने जमकर नारेबाजी की और लोडिंग देने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया. ग्रामीणों का कहना है कि वे शांति और नियम-कानून के तहत अपनी बात रख रहे हैं, लेकिन यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे.

अल्टीमेटम और चेतावनी:

ग्रामीण परिवहन संघ ने जायसवाल निको प्रबंधन को तीन दिन का अल्टीमेटम दिया है. संघ का कहना है कि यदि इस अवधि में उनकी गाड़ियों को खदान से लोडिंग की अनुमति नहीं दी गई, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करेंगे, संघ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्थिति में पैदा होने वाले टकराव और असंतोष की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन और कंपनी प्रबंधन की होगी.

आर्थिक और सामाजिक असर:

यह विवाद केवल कंपनी और ग्रामीण परिवहन संघ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर जिले की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर भी पड़ेगा. छोटे डोंगर और आसपास के गांवों में बड़ी संख्या में लोग परिवहन कार्य से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं. यदि नए संघ को अवसर नहीं मिला तो दर्जनों परिवार रोजगार से वंचित हो जाएंगे. वहीं दूसरी ओर, लगातार हंगामे और विरोध प्रदर्शन से खनन और परिवहन कार्य बाधित होने की भी संभावना है.

कंपनी प्रबंधन की चुप्पी: पूरे मामले में जायसवाल निको प्रबंधन अब तक खुलकर सामने नहीं आया है. ग्रामीणों का कहना है कि जब उन्होंने कंपनी से लिखित जवाब मांगा, तो प्रबंधन ने कोई भी दस्तावेज या आधिकारिक वक्तव्य देने से इंकार कर दिया. प्रबंधन की यह चुप्पी ग्रामीणों के गुस्से को और भड़का रही है.

मीडिया के सामने भी चुप्पी साध गया प्रबंधन: इस पूरे मामले पर मीडिया ने भी जायसवाल निको प्रबंधन से सवाल करने की कोशिश की. लेकिन कैमरे पर आने से कंपनी के अधिकारी कतराते रहे, जब उनसे पूछा गया कि ग्रामीण संघ को लोडिंग क्यों नहीं दी जा रही है, तो उन्होंंने इस पर कोई प्रतिक्रिया देने से साफ इंकार कर दिया. अधिकारियों की यह चुप्पी ग्रामीणों के आक्रोश को और बढ़ा रही है, क्योंकि इससे उनके आरोपों को और बल मिल रहा है.

प्रशासन की चुनौती: स्थानीय प्रशासन के लिए भी यह स्थिति किसी चुनौती से कम नहीं है. एक ओर जहां कंपनी को उत्पादन और परिवहन कार्य निर्बाध रखना है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय ग्रामीणों की नाराजगी को शांत करना भी जरूरी है. यदि समय रहते इस विवाद का समाधान नहीं किया गया, तो खनन कार्य और कानून-व्यवस्था दोनों प्रभावित हो सकते हैं.

निको प्रबंधन से पूछना चाहते हैं कि किसके आदेश से हमें लोडिंग नहीं दिया जा रहा है. यदि मंत्री जी का आदेश है तो हम गांव गांव जाकर बताएंगे कि ग्रामीण परिवहन संघ के लोगों को लोडिंग नहीं दिया जाएगा. इसका जवाब भी हम देंगे. तीन दिन के अंदर समाधान नहीं होने पर उग्र आंदोलन करेंगे- नरसिंह मंडावी, सदस्य, ग्रामीण परिवहन संघ

नारायणपुर के छोटे डोंगर में उठा यह विवाद केवल परिवहन संघों की खींचतान नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के हक और सम्मान से जुड़ा सवाल है. ग्रामीण परिवहन संघ का आरोप है कि उन्हें हाशिए पर धकेला जा रहा है, जबकि कंपनी की चुप्पी मामले को और उलझा रही है। आने वाले तीन दिनों में यह साफ हो जाएगा कि प्रबंधन इस विवाद को सुलझाने की पहल करता है या फिर मामला उग्र आंदोलन की ओर बढ़ेगा.

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