अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस: बुजुर्ग पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा खुश है बुजुर्ग महिलाएं

कोरबा: ऊर्जाधानी कोरबा को मिनीभारत भी कहा जाता है. इसलिए भी क्योंकि सार्वजनिक उपक्रम और अन्य रोजगार के अवसर तलाश में और यहां काम करने देश भर के अलग-अलग क्षेत्र के लोग यहां निवास करते हैं. अब कोरबा में एक ताजा रिसर्च के रोचक नतीजे सामने आए हैं. इस रिसर्च के मुताबिक कोरबा शहर के वृद्धजनों में पुरुषों के मुकाबले परिवार की बुजुर्ग महिलाओं का वक्त ज्यादा खुशनुमा है. जहां दादी नानी को पारिवारिक व भावनात्मक पहलुओं से जुड़े रहने का फायदा मिलता है. तो दूसरी ओर परिवार के बुजुर्ग पुरुष अपेक्षाकृत सामाजिक व आर्थिक कठिनाइयों के चलते कम खुश रहते हैं.
रिसर्च में यह भी बताया गया है कि सामाजिक मूल्यों को सुरक्षित रखना है तो बुजुर्गों का ध्यान रखना जरूरी है. परिवार के बच्चे उनसे दूर हो रहे हैं, जिससे उनमें भावनात्मक गुणों का विकास नहीं हो पा रहा है. रिसर्च में इन समस्याओं के समाधान का भी मार्ग सुझाया गया है.
800 परिवारों से मिलने के बाद पूरा हुआ शोध : कोरबा नगर के विशेष संदर्भ में किए गए शोध में समाजशास्त्री डाॅ प्रीति जायसवाल ने कई निष्कर्ष दिए हैं. वृद्धजनों की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर कोरबा जिले के विशेष संदर्भ में यह शोध और उसका परिणाम साझा करते हुए डाॅ प्रीति जायसवाल ने कहा कि अपने रिसर्च के दौरान उन्होंने 800 बुजुर्गों से उनके दिल का हाल जानने का प्रयास किया. इसमें महिला और पुरुष समान संख्या में शामिल रहे.
सात साल कमला नेहरु महाविद्यालय व उसके बाद अग्रसेन में अतिथि प्राध्यापक रहीं डाॅ प्रीति ने बताया कि महिला वृद्ध जहां स्वयं को घर-परिवार, रिश्तेदार और पड़ोसियों के मध्य व्यस्त रखकर मन को खुश रख पाती हैं, परिवार से भावनात्मक तौर पर जुड़ाव रखती हैं. इस कौशल के अभाव में ज्यादातर पुरुष वृद्ध अकेलापन और अपनी चिंताओं के बीच घिरे रहकर परेशान होने विवश हो जाते हैं. वह अकेलापन महसूस करने लगते हैं और उन्हें जीवन अपेक्षित सा लगने लगता है.
वित्त आयोग की स्थापना के साथ आंगनवाड़ी के तर्ज पर संचालित हो केंद्र :वृद्धजनों को इन समस्याओं से राहत की राह सुझाते हुए प्रीति ने अपना रिसर्च में कुल 6 बिंदू बताए हैं. जिसके अनुसार प्रदेश व देश के हरराज्य में वृद्धजन आयोग की स्थापना की जानी चाहिए. सुविधाजनक सार्वजनिक आवास या देखरेख केंद्र, उचित रोजगार नीति, स्वास्थ्य व मनोरंजन गतिविधियां, पुनर्वास, अधिकारों के संरक्षण के लिए विधिक सहायता जैसे विकल्प निकाले जा सकते हैं. प्रत्येक वार्ड में आंगनबाड़ी की तर्ज पर केंद्रों का संचालन किया जाना चाहिए, जहां मनोरंजन और आजीविका से संबंधित गतिविधियों का संचालन एक्सपर्ट के निगरानी में किए जाने से वृद्धों को आर्थिक और भावनात्मक संबल मिलेगा.
प्रीति कहती है कि बुजुर्गों का ख्याल रखा जाना बेहद जरूरी है. क्योंकि आने वाले 10 दशक के बाद भारत के परिप्रेक्ष्य में वृद्धजनों की संख्या युवाओं से कहीं ज्यादा हो जाएगी. वर्तमान में भी इनकी संख्या बहुत ज्यादा है. इसलिए उनके लिए न सिर्फ सरकारों को बल्कि सामाजिक संस्थाओं और सबको मिलजुल कर प्रयास करना होगा. ऐसे प्रयास और व्यवस्थाएं करने होंगे जिससे कि बुजुर्ग उपेक्षित और अलग-थलग महसूस ना करें. उन्हें अकेलापन और अवसाद से बाहर लाना होगा. क्योंकि पूरे समाज का व्यवहार वृद्धजनों पर ही टिका हुआ है. वह खुश होंगे, संयुक्त परिवार में बच्चों के साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे तो आने वाली पीढ़ियों में मूल्यों का विकास होगा.
उच्च और निम्न की बजाय मध्यम वर्गीय बेहतर: डाॅ प्रीति का कहना है कि वैश्विक अनुपात में भारत में पारिवारिक सामंजस्य की स्थिति अच्छी है. उनके शोध में सभ्रांत व उच्च आय वर्ग, मध्यम व निम्न वर्ग शामिल किए. सभ्रांत वर्ग के वृद्ध आर्थिक रूप से सक्षम व निश्चिंत, लेकिन पारिवारिक चिंताओं से घिरे रहने के कारण परेशान रहते हैं. ठीक इसके विपरीत निम्न आय वर्ग के बुजुर्ग पारिवारिक नहीं, आर्थिक मुश्किलों से जूझने विवश हैं. इस मामले में मध्यम वर्ग के बुजुर्ग सबसे ज्यादा खुश मिले.
रिटायर्ड वृद्ध पुरुष ज्यादा दुखी, इन्हें भी मदद की जरूरत: इस रिसर्च में कोरबा नगर के दस वार्डों पर फोकस कर 60 वर्ष से अधिक आयु के वृद्ध और रिटायर्डकर्मियों पर सर्वे किया गया है. रिटायर्ड कर्मियों ने कहा कि सरकार की योंजनाओं के माध्यम से लाभ मिलना काफी मुश्किल है. कभी पेपर वर्क तो कभी अन्य कारणों से सरकारी अधिकारी ही उन्हें इनके लाभ से वंचित कर देते हैं, पर कठिनाई का हल नहीं निकालते. हालांकि शोध में परिवार के मुखिया की भूमिका में सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि संतोषजनक पाई गई.
डाॅ प्रीति ने इन अनछुए विषय पर अपनी रुचि के विषय में बताया कि बचपन से ही उन्होंने बुजुर्गों को अपनी परेशानियों से अकेले लड़ते देखा है. एक वास्तविक उदाहरण यह रहा कि बहू ने एक वृद्ध सास को जहर दे दिया, एक बेटे ने मां को मार डाला. इस तरह के घटनाओं ने उन्हें दुखी किया और इस विषय को चुनने के लिए विवश किया. यही वजह है जो शोध के लिए उन्होंने यह विषय चुना. उन्होंने भारती विश्वविद्यालय दुर्ग में समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और अपने शोध निदेशक डाॅ स्नेह कुमार मेश्राम के मार्गदर्शन में यह शोध पूर्ण किया.





