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बस्तर दशहरा: हजारों आंखों के सामने हुई बस्तर दशहरे के मुख्य आकर्षण रहे विशालकाय रथ की चोरी

बस्तर: छत्तीसगढ़ के बस्तर में 75 दिनों तक मनाए जाने वाले ऐतेहासिक बस्तर दशहरे में मुख्य आकर्षण का केंद्र विशालकाय मानव निर्मित रथ होता है. जिसे देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ती है. लेकिन विजयदशमी की रातः हजारों आंखों के सामने 08 चक्कों के विशालकाय रथ की चोरी हो गई है.

विजयदशमी के दिन चोरी हुआ बस्तर दशहरा का रथ: दुनिया में सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाले दशहरे पर्व में न भगवान राम का जिक्र है और न ही रावण का है. बल्कि बस्तर में सामूहिक सामाजिक समरसता और देवियों की शक्ति, देवी सुभद्रा का रथ शामिल है. विजयदशमी के अवसर पर जहां पूरे देश में रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है. वहीं बस्तर में अनोखी भीतर रैनी रस्म की अदायगी की जाती है. जिसमें 08 चक्कों के विशालकाय रथ में दंतेश्वरी देवी के क्षत्र को रथारूढ़ करके नगर भ्रमण करवाया जाता है. और इस नगर भ्रमण करवाने की जिम्मेदारी माड़िया जनजाति निभाती है.

गुरुवार और शुक्रवार की आधी रात को इस रस्म का आयोजन धूमधाम से किया गया. करीब 600 सालों से यह पुरानी परंपरा अनवरत चली आ रही है. रथ खींचने के बाद आधी रातः को माड़िया जनजाति ने रथ की चोरी की और राजमहल से करीब 4 किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट के जंगल में रथ को छुपाया है.

माड़िया जनजाति के लोग करते हैं रथ की चोरी: विशालकाय रथ की चोरी बस्तर दशहरा की एक प्रमुख रस्म है. जिसमें माड़िया समुदाय के लोग रथ चोरी कर ले जाते हैं. लेकिन चोरी को लेकर किसी प्रकार का कोई अपराध पंजीबद्ध नहीं किया गया है. रथ चोरी करने के बाद माड़िया जनजाति के लोगों ने राजपरिवार को सजा सुनाई है. इसके पीछे की नाराजगी आज 600 साल पुरानी परंपरा बन गई है. जिसे विधि विधान के साथ निभाई जा रही है. इस परंपरा को बस्तर के स्थानीय लोग सबसे बड़ा दशहरा पर्व कहते हैं.

बस्तर राजपरिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव ने बताया कि 600 साल पहले महाराजा को रथपति की उपाधि मिलने के बाद दशहरा का पर्व शुरू किया गया. जिसमें सभी समुदाय को विभिन्न जिम्मेदारी सौंपी गई. लेकिन माड़िया समुदाय को कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई. जिससे नाराज होकर माड़िया समुदाय ने रथ की चोरी की और अपनी बात राजा के समक्ष रखी थी. जब यह बात राजदरबार में सामने आई. तब तत्कालीन राजा ने कहा कि जैसा माड़िया जनजाति कहेगी वैसा ही राजपरिवार करेगा.

कमलचंद भंजदेव आगे कहते हैं “एक तरह से इसे एक सजा के रूप में देखा गया. माड़िया समुदाय ने कहा कि महाराजा अपने शाही अंदाज में शान व शौकत के साथ अपने पूरे वेशभूषा में माड़िया जनजाति के साथ संभाग भर से इक्कठे किये गए नए अन्न को जमीन में बैठकर समुदाय के साथ ग्रहण करके नुआखानी का त्यौहार मनाएंगे. इसके बाद शाही अंदाज में रथ को वापस लेकर जाएंगे.”

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