आदिवासी क्षेत्रों में लड़कियों की संख्या हो रही कम, लिंगानुपात के चौंकाने वाले आंकड़े

सरगुजा : लोकसभा क्षेत्र सरगुजा के लिए में जन्म के समय लिंगानुपात के आंकड़े चिंता जनक है.माना जाता है कि यदि हजार लड़कों के अनुपात में 960 लड़कियां हैं तो स्थिति उतनी खराब नही है.नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट में पिछले दो वर्षों के आंकड़ों में पहले की तुलना में दूसरे वर्ष का अनुपात एकदम से बढ़ गया है. सरगुजा लोकसभा के सूरजपुर और बलरामपुर जिले में स्थिति चिंताजनक है. बलरामपुर में जन्म के समय लिंगानुपात 887 हो गया है. सूरजपुर का 916 और कोरिया जिले का 826 हो चुका है.
लिंगानुपात में अंतर होने से समाज को खतरा : विशेषज्ञों के मुताबिक जिस क्षेत्र में लड़कियों की संख्या कम होती है वहां सामाजिक अपराध बढ़ जाते हैं.लिंगानुपात में बड़ा अंतर आ रहा है. सर्वाइवल की बात करें तो जन्म के बाद लड़कियां विषम परिस्थति में अधिक सर्वाइव कर पाती हैं. जबकि लड़कों की मौत जल्दी हो जाती है. मतलब भले ही वयस्क लिंगानुपात फिलहाल बेहतर स्थिति में हैं. लेकिन आने वाले समय में असंतुलित हो जाएगा और ये समाज के लिए चिंता का विषय है.
हेल्थ विभाग की कार्यशाला : इस विषय पर कुछ एनजीओ और सामाजिक संगठनों ने सामूहिक प्रयास किया और एक कार्यशाला के माध्यम से विधायक, सांसद, सामाजिक संगठन, राजनैतिक संगठन के युवाओं की टीम, हेल्थ विभाग की टीम के साथ एक कार्यशाला का आयोजन किया. इन आंकड़ों पर चिंता के साथ इसे सही करने के उपायों पर चर्चा की गई. क्योंकि सरगुजा आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और आदिवासी समाज में लड़का लड़की वाली कुरीति कभी नही थी. यही कारण है कि सरगुजा में लिंगानुपात बेहतर स्थिति में था. लेकिन अब यहां भी अनुपात का बढ़ना बड़ी चिंता का सबब है.
विषय की एक्सपर्ट डॉ आस्था महंत बताती हैं कि वो पिछले 6 साल से बस्तर और सरगुजा में महिला सशक्तिकरण और गर्ल्स रिफार्म पर काम कर रही हूं.चिंता का विषय ये है कि पिछले दो नेशनल फैमली हेल्थ सर्वे का रिपोर्ट जो हम देखे तो उसमें हम पाते हैं कि पहले वाले रिपोर्ट में वो संख्या एकदम से डाउन हो गया है.
बलरामपुर में 887, कोरिया में 826, सूरजपुर में 916 हो गया है. जन्म के समय सेक्स रेसियो समय के साथ डिक्लाइन होता जा रहा है. इसको हम ऐसे मानते हैं कि जिस क्षेत्र में लड़कियों की संख्या कम होती है. वहां सामाजिक अपराध बढ़ जाता है. पहले बहुत पढ़े लिखे लोग टेक्नोलॉजी का यूज करके ऐसा करते थे. लेकिन अब ये आदिवासी समाज में देखने को मिल रहा है, ये गभीर चिंतन का विषय है- डॉ आस्था महंत, एक्सपर्ट
इस दौरान लुंड्रा विधायक प्रबोध मिंज ने कहा कि ये अनुपात चिंता का विषय है. इस पर चर्चा और जागरूकता की जा रही है.सरकार की तरफ से ऐसे कई योजना और प्रयास किए जा रहे हैं. जिनसे लड़के और लड़की में समानता आए. जैसे प्रापर्टी में हिस्सेदारी, नौकरी में आरक्षण जैसे काम किए गये हैं.इसके बाद भी अगर अनुपात बढ़ रहा है तो सभी को इस पर सोचना होगा. सांसद चिंतामणि महाराज ने कहा कि सभी लोगों ने मिलकर अच्छा विषय सामने लाया है, मुझ तो जानकारी ही नही थी की इस तरह का लिंगानुपात हो गया है.
दिल्ली में ये लोग मिले तो चर्चा हुई थी, तभी से सरगुजा में इस पर काम करने की नीति बनी थी.अब सामाजिक संगठन, एनजीओ, स्वास्थ्य विभाग सभी लोग इस विषय पर मिलाकर काम करेंगे तो स्थित बदलेगी, स्वास्थ्य विभाग के नियमों पर किस तरह कार्रवाई हो रही है इस पर भी मैं अधिकारियों से चर्चा करूंगा – चिंतामणि महाराज,सांसद
लिंगानुपात के आंकड़े दो तरह के हैं. एक तो पूरी आबादी में पुरुषों की तुलना में महिला आबादी और दूसरा जन्म के समय लड़के की तुलना में लड़कियों की संख्या. पहले अनुपात में हम बेहतर स्थिति में हैं.सरगुजा जिले की बात करें तो यहां एक हजार पुरुष में 1139 महिला हैं. लेकिन जन्म के समय ये आंकड़ा कम है.जन्म के समय एक हजार लड़कों में 968 लड़कियों का जन्म हुआ है- डॉ. रोजलेन आर एक्का, आरसीएच नोडल अधिकारी
पीसीपीएनडीटी से आरसीएच नोडल अधिकारी डॉ. रोजलेन आर एक्का ने बताया कि इसके कारणों पर हम जाएं तो बार-बार डॉक्टरों पर ये आरोप लगता है कि वो सोनोग्राफी से लिंग जांच करके बताते हैं. ऐसा हम लोग नहीं करते हैं, शायद ही कोई डॉक्टर होगा जो इस तरह का काम कर रहा होगा, लेकिन आज के समय में जो एमटीपी ड्रग्स हैं वो हर दवाई दुकानों में इजली एवलेबल हैं, जबकि शासन की गाइडलाइन हैं कि ये दवाइयां बिना ट्रेंड डॉक्टर की निगरानी के नहीं देना है. लेकिन ये उपलब्ध हैं. जिस कारण मौत भी हो रही हैं. दूसरा कारण है टीनेजर्स को सेक्स एजुकेशन की शिक्षा देना बहुत जरुरी है.जिससे वांटेड प्रेग्नेंसी ना हो.





