सीआरपीएफ भर्ती पर उठे सवाल, एक वर्ग विशेष को मिला मौका, स्थानीय युवाओं में आक्रोश

सुकमा : सुकमा और बीजापुर जिलों में सीआरपीएफ के लिए 300 पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया अब विवादों के घेरे में है. इस भर्ती में केवल अनुसूचित जनजाति (ST) के उम्मीदवारों को शामिल किया गया है, जबकि अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के स्थानीय युवाओं को इससे बाहर रखा गया है. इस निर्णय ने स्थानीय सामाजिक संगठनों और नागरिकों के बीच असंतोष और सवालों की लहर खड़ी कर दी है।
सीएम को पूर्व विधायक ने लिखा खत : पूर्व विधायक और बस्तरिया राज मोर्चा के संयोजक मनीष कुंजाम ने इस मामले में राज्यपाल और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखा है.उन्होंने मांग की है कि भर्ती प्रक्रिया में SC और OBC वर्ग के उम्मीदवारों को भी शामिल किया जाए. उनका कहना है कि सैकड़ों वर्षों से ये वर्ग इस क्षेत्र में निवासरत हैं और जनजातीय समाज के साथ उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक जीवनशैली, परंपराएं और रीति-रिवाज घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं. ऐसे में उन्हें भर्ती प्रक्रिया से बाहर रखना भेदभावपूर्ण और संवैधानिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है.

एक वर्ग तक सीमित है भर्ती : नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता देना सामान्य तौर पर समझा जा सकता है, लेकिन केवल एक वर्ग तक भर्ती को सीमित करना संवैधानिक समानता के सिद्धांत के विपरीत है. यह भी सवाल उठता है कि यदि स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जा रही है, तो अन्य सरकारी विभागों और छोटे अस्थायी पदों पर ऐसा क्यों नहीं किया जाता. DMF फंड से होने वाली नियुक्तियों में भी स्थानीय स्तर की भर्ती के बजाय राज्य स्तरीय परीक्षा (व्यापम) का सहारा लिया जाता है.

कानूनी जानकारों का कहना है कि संविधान की पांचवीं अनुसूची राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों का संरक्षक बनाती है और भर्ती प्रक्रिया में इसका उद्देश्य स्थानीय युवाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना होना चाहिए. विशेषज्ञों ने इसे सरकार के सुविधा अनुसार संवैधानिक प्रावधानों के चयनात्मक उपयोग के रूप में देखा है.





