February 12, 2026 6:55 pm
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पाकिस्तान से वापस आएगी ये भारतीय महिला, पहलगाम हमले के बाद छोड़ना पड़ा था देश

22 अप्रैल को हु्ए पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान भेजी गई एक रिटायर अधिकारी की 63 वर्षीय पत्नी रक्षंदा राशिद को जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने भारत में दोबारा आने की इजाजत दे दी है. 30 जुलाई को हाई कोर्ट के फैसले के बाद उन्हें भारत लौटने की राहत मिली है. भारत सरकार ने उन्हें विजिटर वीजा जारी करने का निर्णय लिया है ताकि वो भारत आकर अपने परिवार से मिल सकें.

जम्मू के तालाब खटिकान इलाके की रहने वाली रक्षंदा जो पाकिस्तान की नागरिक हैं, ये पिछले 30 वर्षों से भारत में रह रही थीं, लेकिन अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तानी नागरिकों के वीजा रद्द कर दिए गए थे. 60 व्यक्तियों को पाकिस्तान भेज दिया गया था. रक्षंदा राशिद का दीर्घकालिक वीजा रद्द कर दिया गया. उनके पति शेख जहूर अहमद भारतीय नागरिक हैं और वो जम्मू-कश्मीर में ही रह रहे हैं.

भारत छोड़ने का नोटिस और पाकिस्तान वापसी

रक्षंदा 10 फरवरी 1990 को 14 दिनों के विजिटर वीजा पर भारत आई थीं. इसके बाद उन्हें दीर्घकालिक वीजा दिया गया जिसे हर साल रिन्यू किया जाता रहा. जम्मू में उन्होंने एक भारतीय नागरिक से शादी कर ली थी. वो कई सालों से अपने परिवार के साथ रह रही थीं. रक्षंदा को भारत छोड़ने का नोटिस मिला. जिसके तहत उन्हें 29 अप्रैल 2025 को अटारी-वाघा बॉर्डर के रास्ते पाकिस्तान वापस भेज दिया गया.

परिवार द्वारा कोर्ट में याचिका दाखिल करना

रक्षंदा के परिवार ने उनके पाकिस्तान जाने के बाद कोर्ट में याचिका दायर की. जिसमें उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के अंदर रक्षंदा का कोई नहीं है. वो बीमार चल रही हैं. लाहौर के एक होटल में अकेली रह रही है. इस पर अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह 10 दिनों के भीतर रक्षंदा को वापस भारत लाने की व्यवस्था करे.

अदालत का केंद्र सरकार को निर्देश

भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को सूचित किया कि सरकार ने रक्षंदा को दोबारा से विजिटर वीजा जारी करने का सैद्धांतिक निर्णय लिया है. इसके तहत उन्हें भारत में प्रवेश करने की अनुमति दी जाएगी और वो अपनी नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकेंगी. मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली एवं न्यायमूर्ति राजनेश ओसवाल की संयुक्त पीठ ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को मान्यता देते हुए याचिका को समाप्त कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय केवल विशेष परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है और इसे अन्य मामलों में मिसाल के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा.

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