सागर का ऐतिहासिक किला लाखा बंजारा, यहां 7 महीने तक बंधक थे 370 अंग्रेज

सागर: शहर के बीचोबीच स्थित लाखा बंजारा झील किनारे बना ऐतिहासिक किला आज भी स्वतंत्रता संग्राम की गवाही देता है. देश की आजादी के पहले 1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों ने ऐसी बहादुरी दिखाई थी कि 370 अंग्रेजों को सागर के इस किले में 7 महीनो के लिए बंधक बना लिया था. आज भी ये किला सागर की लाखा बंजारा झील के पास मौजूद है, जहां अब पुलिस ट्रेनिंग सेंटर संचालित होता है.
क्या है सागर के किले का इतिहास
सागर शहर की स्थापना की बात करें, तो इसका श्रेय दांगी राजा उदन शाह को जाता है. उन्होंने 1660 में एक छोटा सा किला झील किनारे बनवाया था. किले के नजदीक एक छोटा सा परकोटा गांव बसाया गया था. 1735 के बाद सागर पेशवाओं के अधीन आ गया. महाराजा छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को अपना बेटा मानते हुए उन्हें बुंदेलखंड का इलाका उपहार के तौर पर दिया था. इसके बाद जब अंग्रेजों ने देश पर कब्जा शुरू किया, तो 1818 में बाजीराव पेशवा द्वितीय ने सागर अंग्रेजों को सौंप दिया था. इसके बाद 1835 में सागर में अंग्रेजों ने छावनी की स्थापना की और इस किले को अपनी आयुधशाला बनाया था. फिर 1905 में अंग्रेजों ने यहां पर पुलिस ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की, जो आज जवाहरलाल नेहरू अकादमी के तौर पर जानी जाती है.
जब 370 अंग्रेज बनाए गए बंधक
1857 की क्रांति की बात करें, तो इसका सबसे ज्यादा असर सेंट्रल इंडिया और खासकर बुंदेलखंड में देखने मिला था. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के अलावा बुंदेलखंड के सागर के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था. यहां के राजा बखतवली, राजा मर्दन सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने पूरे सागर जिले पर अधिकार कर लिया था, लेकिन सागर के किले पर अपना अधिकार नहीं कर पाए थे. क्योंकि यहां 1835 में अंग्रेजों ने छावनी की स्थापना की थी. जिस वजह से किले में बड़ी संख्या में सैनिक मौजूद थे और उन्होंने सागर किले को अपनी आयुधशाला बनाया था.
जैसे ही 1857 की क्रांति का सागर में आगाज हुआ, तो सागर छावनी की फौज के अंग्रेजों के परिवारों को छावनी से आयुधशाला में भेज दिया गया था. 27 जून 1857 को 370 अंग्रेज जिनमें 173 पुरुष, 63 महिलाएं और 134 बच्चे थे. अंग्रेजों को अंदाजा नहीं था कि वो अपनी ही आयुधशाला में बंधक बन जाएंगे. महज 4 दिन बाद एक जुलाई 1857 को क्रांतिकारियों की 42वीं देसी पलटन के सीनियर सूबेदार शेख रमजान ने किले से कुछ दूरी पर बनी मस्जिद के द्वार पर नगाड़ा बजाकर क्रांति का शंखनाद कर दिया और कुछ ही देर में अंग्रेजों की आयुधशाला यानी किले को घेर लिया था.
7 महीने 7 दिन तक बंधक रहने के बाद हुए मुक्त
हालात ये बने की शेख रमजान के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की पलटन ने किले को चारों तरफ लगातार घेरे रखा और 370 अंग्रेज उसी किले में बंधक बने रहने के लिए मजबूर हो गए. तत्कालीन अंग्रेज अफसरों द्वारा लिखे गए लेटरों में इसका उल्लेख साफ तौर पर मिलता है. दूसरी तरफ अंग्रेजों की सेंट्रल इंडिया फोर्स के ब्रिगेडियर क्रांति का दमन करते हुए सागर पहुंचा और 3 फरवरी 1858 में उसने सागर की क्रांति का दमन करते हुए सभी बंधक अंग्रेजों को मुक्त कराया.
क्या कहते हैं इतिहासकार
इतिहासकार डाॅ. भरत शुक्ला बताते हैं, “1857 की जो क्रांति का बिगुल सागर में 42 वीं पलटन के सूबेदार शेख रमजान ने फूंका था. उन्होंने सागर के किले में जहां अंग्रेजों की आयुधशाला थी, अपने क्रांतिकारियों के साथ चारों तरफ घेरा डाल दिया. उस समय अंग्रेजी सेना के जो तत्कालीन ब्रिगेडियर थे, उन्होंने क्रांतिकारियों के डर से किले को बंद कर लिया, जिसके भीतर 370 अंग्रेज थे. सभी अंग्रेज उसी किले में बंधक बने रहे, क्योकिं क्रांतिकारी चारों तरफ से किले को घेरे थे. 7 महीने 7 दिन बाद जनरल ह्यूरोज ने 3 फरवरी 1858 को क्रांतिकारियों से किले को आजाद कराया. उस समय अंग्रेजों की जान पर खतरा बन आया था, क्योंकि क्रांतिकारी बगावती तेवरों के साथ किले को घेरे हुए थे. वो देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से बदला लेने के साथ-साथ उन्हें देश से बाहर करने के लिए प्रतिबद्ध थे.”





