February 11, 2026 9:13 am
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छत्तीसगढ़

सीतानदी उदंती में दिखा दुर्लभ ‘लेपर्ड कपल’, कैमरे में कैद हुई तेंदुए के जोड़े की अठखेलियां; जंगली जानवरों का स्वर्ग बना टाइगर रिजर्व

धमतरी: छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ धान के कटोरे और माओवादियों से नहीं होती. छत्तीसगढ़ की असल पहचान यहां के जल, जंगल और जमीन से भी होती है. घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा छत्तीसगढ़ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है. यहां के घने जंगलों में हाथियों, भालुओं और तेंदुओं की भरमार है. पहाड़ और जंगल की वजह से यहां यहां बड़ी संख्या में तेंदुए पाए जाते हैं. सबसे ज्यादा संख्या में तेंदुए धमतरी और कांकेर में देखे जाते हैं. खाने पीने और पानी के भरपूर स्रोत इन जंगली जीवों को यहां बेहतर आशियान देते हैं. इसके साथ ही यहां के रिजर्व फॉरेस्ट में बड़ी संख्या में दुर्लभ जीव जंतु भी पाए जाते हैं. धमतरी जिले में अक्सर तेंदुए शिकार की तलाश में रिहायशी इलाकों के करीब तक पहुंच जाते हैं.

वन विभाग के कैमरे में तेंदुए का जोड़ा हुआ कैप्चर

रविवार की रात नर और मादा तेंदुए एक साथ चहलकदमी करते हुए कैमरे में कैद हुए हैं. वन विभाग के कैमरे में नर और मादा तेंदुए उछलकूद मचाते हुए नजर आ रहे हैं. सीतानदी उदंती टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरूण जैन ने तेंदुए के जोड़े के देखे जाने की पुष्टि की है. वन विभाग ने एहतियात के तौर पर सीतानदी टाइगर रिजर्व के आस पास रहने वाले लोगों को सतर्क किया है. वन विभाग की ओर से कहा गया है इलाके में तेंदुए का जोड़ा सक्रिय है. सुरक्षा के लिहाज गांव वाले सतर्क रहें.

वन विभाग जंगल में पेट्रोलिंग के लिए निकली थी

वन विभाग की ओर से बताया गया कि सीतानदी अभयारण्य की टीम एसडीओ के नेतृत्व में जंगल का निरीक्षण करने के लिए निकली थी. टीम जब सीतानदी टाइगर रिजर्व के पहाड़ी और घासवाले इलाके में पहुंची तो वहां पर तेंदुए का जोड़ा उनको नजर आया. कैमरे में कैद तेंदुए का जोड़ा काफी स्वस्थ दिखाई दिया. तेंदुए के जोड़े की मौजूदगी से वन विभाग की टीम काफी खुश है. वन विभाग ने बताया कि वो रुटीन प्रक्रिया के तहत जंगल में गश्त के लिए जाते रहते हैं. नियमित निरीक्षण से जंगली जानवरी सुरक्षित भी रहते हैं और गश्त से शिकाारियों का खतरा भी कम होता है.

रविवार रात एसडीओ अपनी टीम के साथ सीतानदी अभयारण्य का निरीक्षण करने कि लिए निकले थे. जंगल के किनारे तेंदुए का जोड़ा उनको नजर आया. वन विभाग की टीम ने जिस जोड़े की तस्वीर ली है, उसमें एक नर और एक मादा तेंदुआ है. हमने लोगों को सतर्क करने के निर्देश दिए हैं: वरूण जैन, उप निदेशक, उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व, धमतरी

कहां पाए जाते हैं ज्यादातर तेंदुए

लेपर्ड अक्सर पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं. पहाड़ के आस पास जहां पानी का स्रोत होता है, वहां पर ये ज्यादा पाए जाते हैं. कांकेर और धमतरी सहित इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान में तेंदुए की अच्छी खासी संख्या है. छत्तीसगढ़ के जंगल तेंदुए की रिहाइश के लिए सुरक्षित माने जाते हैं. कांकेर, धमतरी और दंतेवाड़ा जैसे जगहों में कई बार तेंदुए शिकार की तलाश में गांव के आस पास तक पहुंच जाते हैं.

लेपर्ड की खासियत

  • यह एक फुर्तिला जानवर होता है
  • इसके शरीर पर काले काले गोल जैसे धब्बे होते हैं
  • यह बिल्ली की प्रजाति का जीव माना जाता है
  • तेंदुए अफ्रीका और एशिया में ज्यादा पाए जाते हैं
  • ऊंची चढ़ाई चढ़ने में ये माहिर होते हैं
  • अपने शिकार को ये अक्सर पेड़ पर लेकर जाता है.

छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध वन्यजीव अभयारण्यों से जुड़ी जानकारी

सीतानदी वन्यजीव अभयारण्य

धमतरी जिले में सीतानदी वन्यजीव अभयारण्य है. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत साल 1974 में सीतानदी वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना हुई. इस अभयारण्य का क्षेत्रफल लगभग 556 वर्ग किलोमीटर है. सीतानदी नदी के नाम पर ही सीतानदी वन्यजीव अभयारण्य नाम है.

उदंती वन्यजीव अभयारण्य

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत साल 1983 में उदंती वन्यजीव अभयारण्य स्थापित हुआ. अभयारण्य का नाम उदंती नदी से लिया गया है. उदंती अभ्यारण्य लगभग 232 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है. उदंती अभयारण्य विशेष तौर पर लुप्तप्राय जंगली भैंसों का निवास स्थान है. यहां उनके संरक्षण और विकास के लिए प्रयास किए जा रहे हैं.

भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य

भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य कवर्धा जिले में है. भोरमदेव मंदिर पर इस अभयारण्य का नाम रखा गया है. भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण्य सकारी नदी के किनारे है. घने जंगल और सालभर पीने का पानी यहां उपलब्ध रहता है.

बारनवापारा अभयारण्य

महासमुंद जिले के उत्तरी भाग में बारनवापारा अभयारण्य है. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत इसे 1976 में स्थापित किया गया. बारनवापारा अभयारण्य 245 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है. बारनवापारा अभयारण्य में बाघ, तेंदुए, भालू, लकड़बग्घे, वनभैंसे, सांभर, चीतल जैसे कई वन्यजीव निवास करते हैं.

पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य

दंतेवाड़ा में स्थित पामेड़ वन्यजीव अभयारण्य 262 वर्ग किमी में फैला है. पामेड़ अभयारण्य के भीतर साल और सागौन जैसी कीमती वृक्षों की प्रजातियां मौजूद हैं, जो इसके महत्व को बढ़ाती हैं. अभयारण्य में हिरण की प्रजाति चीतल, भारतीय चिकारे और चिंकारा सहित विभिन्न प्रकार के वन्यजीवों निवास करते हैं.

तमोर पिंगला वन्यजीव अभयारण्य

सरगुजा में स्थित तमोर पिंगला वन्यजीव अभयारण्य साल और पर्णपाती पेड़ों से घिरा हुआ है. इसकी वजह से वन्यजीव अभ्यारण्य की भौगोलिक विविधता और बढ़ जाती है. तमोर पिंगला वन्यजीव अभयारण्य का नाम पिंगला नाला और तमोर पहाड़ी के नाम पर रखा गया है. यहां भालू, गौर, वन भैेंसा, चीतल, लकड़बग्घा और पहाड़ी मैना समेत कई प्रजाति की पक्षियों का प्राकृतिक आवास है.

सेमरसोत वन्यजीव अभयारण्य

सरगुजा के अंबिकापुर-डाल्टनगंज रोड पर सेमरसोत के पास स्थित है. इसके चलते इसका नाम सेमरसोत वन्यजीव अभ्यारण्य रखा गया है. सेमरसोत अभयारण्य में साल, पर्णपाती जैसे कई पेड़ पाए जाते हैं.

भैरमगढ़ वन्यजीव अभयारण्य

बीजापुर से 48 किमी दूर भैरमगढ़ वन्यजीव अभयारण्य है. अभयारण्य घने जंगलों से घिरा है. इंद्रावती नदी के बीचो बीच होने के चलते यहां जंगली जानवरों का बेहतरीन आशियाना है. अभ्यारण्य विशेष रूप से जंगली भैंसें, चिंकारा, भारतीय गजेल, चीतल पहाड़ी लकड़बग्घों के लिए जाना जाता है.

गोमर्डा वन्यजीव अभयारण्य

रायगढ़ (सारंगढ़) शहर के पास गोमर्डा अभयारण्य है. यहां कई दुर्लभ जीवों और विदेशी प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है. गोमर्डा अभयारण्य में गौर, नीलगिरि, बार्किंग हिरण, सांभर, मंटजैक, चौसिंघा, स्लॉथ भालू, ढोले (जंगली कुत्ता), जंगली सूअर और सियार सहित कई वन्य जीव रहते हैं.

बादलखोल अभयारण्य

रायगढ़ से 160 किलोमीटर दूर बादलखोल अभयारण्य छत्तीसगढ़ के प्रमुख वन्यजीव अभयारण्य में से एक है. बादलखोल अभयारण्य का लगभग 44 फीसदी क्षेत्र घने जंगलों से ढंका है. अभ्यारण्य में कई तरह के पक्षी और वन्यजीव प्रजातियों का प्राकृतिक आशियाना है.

अचानकमार टाइगर रिजर्व

एमपी के सीमावर्ती क्षेत्र से लगे मुंगेली जिले में अचानकमार वन्यजीव अभयारण्य है. अचानकमार अभयारण्य सतपुड़ा के 553.286 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है. इस अभयारण्य में मैकाल रेंज की विशाल पहाड़ियां मौजूद है, जहां साल, बांस और सागौन के वृक्ष पाए जाते हैं. अचानकमार अभयारण्य में बाघ, तेंदुआ, गौर, उड़न गिलहरी, बायसन, हिरण, भालू, लकड़बग्घा, सियार, चिंकारा सहित कई स्तनधारी जीव और विभिन्न प्रजीतियों के पक्षी मौजूद हैं. टाइगर की संख्या बढ़ने पर साल 2007 में इसे बायोस्फीयर घोषित किया गया. साल 2009 में अचानकमार अभ्यारण्य को टाइगर रिजर्व क्षेत्र घोषित किया गया. यह अब अचानकमार टाइगर रिजर्व के नाम से जाना जाता है.

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