March 9, 2026 4:41 pm
ब्रेकिंग
Jharkhand SIR Controversy: झारखंड में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सियासी घमासान, इंडिया गठबंधन ने चुनाव... हजारीबाग की ऐतिहासिक रामनवमी का शंखनाद! महासमिति अध्यक्ष के लिए 10 धुरंधर मैदान में; 14 मार्च को होग... Jharkhand Minister Irfan Ansari: नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर इरफान अंसारी ने ली चुटकी, पश्चिम बं... रांची यूनिवर्सिटी के छात्रों का भविष्य दांव पर! UG रिजल्ट अटका तो PG में कैसे होगा दाखिला? पटरी से उ... Rajrappa Temple News: रजरप्पा में श्रद्धालुओं से मारपीट मामले में बड़ी कार्रवाई, रामगढ़ एसपी ने 5 पु... Bilaspur Sand Mining: बिलासपुर के घाटों पर अवैध रेत उत्खनन का बोलबाला, कार्रवाई के नाम पर खानापूर्ति... दुर्ग में 'अफीम' पर संग्राम! "धान का कटोरा अब अफीम का कटोरा?" भाजपा नेता के खेत में अफीम मिलने पर का... "मेरी हत्या की साजिश रची जा रही है..." भाजपा विधायक रिकेश सेन के आरोप से छत्तीसगढ़ की राजनीति में भू... भोपालपटनम में 'मवेशी तस्करी' का बड़ा नेटवर्क ध्वस्त! जंगल के रास्ते तेलंगाना ले जाए जा रहे 171 मवेशी... MCB News: मनेंद्रगढ़ में बेटी को बचाने तालाब में कूदी मां की डूबने से मौत, महिला दिवस पर छाया मातम; ...
धार्मिक

महाभारत का वो रहस्यमयी योद्धा! जिसे मिला तो था ‘श्राप’, लेकिन वही अंत में बन गया सबसे बड़ा ‘वरदान’; हैरान कर देगी ये कहानी

महाभारत के महायुद्ध में भीष्म पितामह का नाम श्रद्धा और समर्पण के साथ लिया जाता है. वे न केवल हस्तिनापुर के संरक्षक थे, बल्कि धर्म और सत्य के प्रतीक भी माने जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भीष्म पितामह का जीवन किसी साधारण इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे श्राप और वरदान के चक्र में फंसा था.आज हम महाभारत के उसी रहस्य की बात करेंगे, जहां एक श्राप ने भीष्म के जीवन की दिशा बदल दी.

कौन थे भीष्म पितामह?

महाभारत में भीष्म पितामह को सबसे महान और शक्तिशाली योद्धाओं में से एक माना जाता है. उनका असली नाम देवव्रत था. वे राजा शांतनु और मां गंगा के पुत्र थे. देवव्रत बचपन से ही बहुत ही तेजस्वी, वीर और धर्मपरायण थे. उन्होंने वेद, शास्त्र और युद्धकला में महारत हासिल की थी. महाभारत में उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान भी प्राप्त था, यानी वे अपनी इच्छा से ही मृत्यु को स्वीकार कर सकते थे.

कैसे मिला था श्राप?

पौराणिक कथा के अनुसार, भीष्म पितामह का जन्म वास्तव में आठ वसुओं के श्राप के कारण हुआ था. कहा जाता है कि एक बार आठ वसु अपनी पत्नियों के साथ पृथ्वी पर घूम रहे थे. उसी दौरान उनकी नजर महर्षि वशिष्ठ की दिव्य गाय नंदिनी पर पड़ी. वसुओं में से एक की पत्नी उस गाय को लेना चाहती थी. पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए वसुओं ने मिलकर नंदिनी गाय को चुरा लिया. जब महर्षि वशिष्ठ को यह बात पता चली तो वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने आठों वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया.

श्राप से मुक्ति कैसे मिली?

वसुओं ने महर्षि वशिष्ठ से क्षमा मांगी. तब ऋषि ने कहा कि सात वसुओं को जन्म लेते ही मुक्ति मिल जाएगी, लेकिन जिस वसु ने चोरी की योजना बनाई थी, उसे पृथ्वी पर लंबा जीवन बिताना पड़ेगा. इसी कारण आठवें वसु का जन्म देवव्रत यानी भीष्म पितामह के रूप में हुआ. उनकी माता गंगा ने जन्म के बाद सात बच्चों को नदी में प्रवाहित कर दिया, जिससे उन्हें तुरंत श्राप से मुक्ति मिल गई. लेकिन आठवें पुत्र देवव्रत को जीवित रखा गया, क्योंकि उन्हें पृथ्वी पर अपना जीवन पूरा करना था.

श्राप कैसे बन गया वरदान?

यही श्राप आगे चलकर वरदान साबित हुआ. देवव्रत ने अपने जीवन में कई महान कार्य किए और इतिहास में अमर हो गए. उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया. उनकी इस कठिन प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया. इसी प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म पड़ा.

महाभारत युद्ध में भीष्म की भूमिका

महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की ओर से सेनापति बने थे. उनकी युद्धकला इतनी अद्भुत थी कि उन्हें पराजित करना लगभग असंभव माना जाता था. कहा जाता है कि जब तक भीष्म पितामह युद्धभूमि में थे, तब तक पांडव सेना के लिए विजय प्राप्त करना बहुत कठिन था.

शरशैया पर लेटे रहे भीष्म

महाभारत युद्ध के दौरान अर्जुन के बाणों से घायल होकर भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेट गए थे. लेकिन इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण उन्होंने तुरंत प्राण त्याग नहीं किए. उन्होंने उत्तरायण आने तक इंतजार किया और फिर अपनी इच्छा से शरीर त्याग दिया.

Related Articles

Back to top button