ग्वालियर के मरीजों की चांदी! अब फ्री जैसे दाम में होगा ऑपरेशन, सालों से धूल खा रही मशीन हुई शुरू

ग्वालियर: जिला अस्पताल में बिना चीरफाड़ किए पहली बार पथरी का सफल ऑपरेशन हुआ है. ये ऑपरेशन पहली बार उस लेप्रोस्कोपी मशीन से किया गया जो पिछले 2 साल से अस्पताल के एक कोने में पड़ी धूल खा रही रही थी. आखिरकार इस मशीन की शुरुआत के साथ ही जिला अस्पताल आने वाले पथरी के मरीजों को इलाज में हाईटेक सुविधा की राह खुल गई है.
सालों से धूल खा रही थी 95 लाख की मशीन
ग्वालियर जिला अस्पताल के लिए स्वास्थ्य विभाग ने करीब 2 साल पहले 95 लाख रुपये खर्च कर हाईटेक लेप्रोस्कोपी मशीन खरीदी थी. लेकिन देख-रेख का अभाव और तकनीक खराबी के चलते लाखों की मशीन लंबे समय से खराब पड़ी रही. हाल ही में अस्पताल प्रबंधन में हुए बदलाव के बाद इस मशीन को ठीक कराया गया. ताकि इस मशीन का उपयोग कर मरीजों का इलाज आधुनिक तरीके से हो सके.
लेप्रोस्कोपी विधि से किया महिला का ऑपरेशन
आखिरकार मशीन ठीक होने के बाद मंगलवार को इसी मशीन की मदद से बिना चीरा लगाए पथरी का सफल ऑरेशन किया गया. लेप्रोस्कोपी के जरिए ऑपरेशन करने वाली टीम में शामिल रहे डॉ. प्रणय दीक्षित ने बताया, “हाल ही में ग्वालियर के मोतीझील क्षेत्र निवासी माधवी यादव अस्पताल में भर्ती हुई थी. उन्हें एक साल से पेट में दर्द की शिकायत थी. जांच में पाया गया कि उनके गाल ब्लैडर में पथरी है.
आम तौर पर पथरी के लिए चीरा लगाकर ऑपरेशन किया जाता है और शरीर से पथरी निकल दी जाती है. लेकिन इसमें मरीज को रिकवरी में काफी समय लगता है, इसलिए मैं और मेरी टीम ने ये ऑपरेशन लेप्रोस्कोपी के जरिए करने का फैसला लिया और ऑपरेशन सफल रहा. मरीज फिलहाल पूरी तरह सामान्य स्थिति में है.”
गाल ब्लैडर से निकला 19.5 एमएम का स्टोन
मरीज माधवी यादव ने बताया, “मेरे गाल ब्लैडर में 19.5 एमएम की पथरी थी. साथ ही काफी अन्य परेशानियां थी, जिनमें गायनिक समस्याएं और आंतों में सूजन भी थी. इसकी वजह से ऑपरेशन का नाम सुनकर ही मैं काफी डरी हुई थी. लेकिन डॉक्टर से मिली तो उन्होंने समझाया. जिससे मेरा थोड़ा विश्वास जागा. जब ऑपरेशन हुआ तो कुछ पता ही नहीं चला कि कब उन्होंने पथरी निकाल दी.”
क्या है लेप्रोस्कोपी तकनीक?
लेप्रोस्कोपी मशीन एक आधुनिक उपकरण है, जिसका उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में शरीर के पेट या कमर के अंदरूनी हिस्सों को जांच और सर्जरी में किया जाता है. यह एक तरह की आधुनिक दूरबीन है जिसमें एक पतली सिन्नली के जरिए पेट में छोटा सा छेद किया जाता है और उस नली में कैमरा और लाइट की मदद से शरीर के अंदर के हिस्सों को मॉनिटर पर देखा जा सकता है. इस तकनीक के जरिए पथरी को भी उसी पतली नली से निकाला जाता है.
लेप्रोस्कोपी के जरिए ऑपरेशन में मरीज को दर्द का अहसास बहुत कम होता है. साथ ही उसकी रिकवरी भी तेज होती है. इसमें आम चीरे की तुलना में शरीर पर मामूली सा निशान आता है. आम तौर पर लेप्रोस्कोपी का उपयोग गाल ब्लैडर से पथरी निकालने के अलावा यूटेरस या बांझपन की जांच के लिए भी किया जाता है.
डॉ. प्रणय दीक्षित की माने तो “इस सुविधा के शुरू होने से अब मध्यमवर्गीय परिवारों के मरीजों को निजी अस्पतालों में हजारों रुपए खर्च नहीं करने पड़ेंगे. साथ ही दूरबीन पद्धति से न केवल समय की बचत होगी, बल्कि संक्रमण का खतरा भी कम से कम होगा. जो मरीज और उसके परिवार दोनों के लिए फायदेमंद होगा.”





