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Jharkhand News: झारखंड के जनजातीय भाषा विभाग में शिक्षकों का भारी टोटा, 40 साल से नहीं हुई एक भी नई नियुक्ति

रांची:राजधानी रांची स्थित जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, जिसकी स्थापना वर्ष 1980 में हुई थी और 1986 में पहली बार यहां प्रोफेसरों की नियुक्ति की गई थी, आज गंभीर शिक्षक संकट से जूझ रहा है. हैरानी की बात यह है कि 1986 के बाद से अब तक विभाग में एक भी नई नियुक्ति नहीं हुई है. समय के साथ कई शिक्षक सेवानिवृत्त हो चुके हैं और कुछ का निधन भी हो गया, लेकिन रिक्त पदों को भरने की दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई है.

राज्य में एक ओर जहां जनजातीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन की बात की जाती है, वहीं दूसरी ओर इस विभाग की बदहाल स्थिति कई सवाल खड़े करती है. झारखंड जैसे राज्य में, जहां जनजातीय भाषाएं सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा हैं, वहां इस तरह की उपेक्षा चिंताजनक मानी जा रही है.

विश्वविद्यालयों में जनजातीय भाषाओं के शिक्षकों की कमी

यह स्थिति सिर्फ रांची तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों में भी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई से जुड़े विभागों की हालत कमोबेश यही है. विनोद बिहारी महतो विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले कई कॉलेजों में क्षेत्रीय भाषा के शिक्षक ही नहीं हैं. वहीं सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, विनोबा भावे विश्वविद्यालय में भी शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है.

यहां तक कि जनजातीय भाषा विभाग में विभागाध्यक्ष छोड़ स्थायी शिक्षक नहीं होने की बात सामने आई है. जानकारी के अनुसार, वर्ष 1986 में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में कुल 51 शिक्षकों की बहाली की गई थी, लेकिन वर्तमान में इनमें से अधिकांश शिक्षक या तो सेवानिवृत्त हो चुके हैं या उनका निधन हो चुका है. अब गिने-चुने शिक्षकों के भरोसे पूरे विभाग का संचालन किया जा रहा है, जिससे शैक्षणिक गतिविधियां भी प्रभावित हो रही हैं.

उच्च शिक्षा की हालात बदतर

शिक्षकों का कहना है कि वे लगातार इस मुद्दे को उठाते आ रहे हैं, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. विभाग में पढ़ाई कर रहे छात्रों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. कई विषयों की कक्षाएं नियमित रूप से नहीं चल रही हैं, जिससे छात्रों का भविष्य भी प्रभावित हो रहा है.

शिक्षकों ने लोकभवन और राज्य सरकार से की मांग

एक बार फिर शिक्षकों ने राज्य सरकार, लोकभवन और संबंधित प्रशासनिक महकमे से इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान देने की अपील की है. शिक्षकों का कहना है कि अगर जल्द ही नियुक्ति प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, तो जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और अध्ययन पर इसका दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

वहीं शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड की भाषाई विविधता को बचाने के लिए ऐसे विभागों को मजबूत करना बेहद जरूरी है. ऐसे में अब देखना होगा कि सरकार इस दिशा में क्या कदम उठाती है.

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