दिसंबर 2016 की बात है. डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जा चुके थे, लेकिन शपथ ग्रहण बाकी था. ट्रंप की राजनीति, कूटनीति, रणनीति…सब कुछ उलझी हुई थी. वो कुछ भी बोल रहे थे. उस वक्त अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति बनना अमेरिका के राजनीति की असाधारण घटना है, जिसे दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा, इसलिए उनका सत्ता में आना दुनिया के तमाम देशों के लिए चौंकाने वाला अनुभव है.
दस साल बाद भी ट्रंप की नीतियां चौंकाने वाली ही हैं. वो कब क्या करेंगे? कोई नहीं जानता. ट्रंप के टारगेट बदलते रहते हैं लेकिन एक टारगेट ऐसा है, जिसे ट्रंप हर हाल में खत्म करना चाहते हैं. वो टारगेट ईरान नहीं है. उसका नाम है नाटो. दुनिया का सबसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन, जिसे अमेरिका ने ही बनाया. उसी गठबंधन को ट्रंप अमेरिका पर बोझ, निकम्मा, पेपर टाइगर और जाने क्या-क्या बता रहे हैं.
अब यूरोप ने भी मान लिया है कि नाटो को अमेरिका के बिना ही चलाना होगा. ऐसे में आइए जानते हैं कि पूरा खेल क्या है?
पुतिन-मैक्रों की मुलाकात और यूक्रेन की जिद
इसके लिए कुछ साल पीछे चलते हैं. 8 फरवरी 2022… पुतिन और मैक्रों की मुलाकात. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों क्रेमलिन पहुंचे, तब तक अमेरिका की शह पर यूक्रेन तब तक नाटो में शामिल होने की जिद ठान चुका था.
रूस के राष्ट्रपति पुतिन ऐलान कर चुके थे कि उन्हें रूस की सरहद पर नाटो की मौजूदगी किसी कीमत पर मंजूर नहीं है. राष्ट्रपति मैक्रों नाटो और यूरोप की ओर से पुतिन को समझाने आए थे, लेकिन राष्ट्रपति पुतिन अपनी बात पर अड़े रहे. पुतिन ने कहा था- हम नाटो की सैन्य शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकते, ये सच्चाई है लेकिन किसी को ये नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया के सबसे आधुनिक परमाणु हथियार रूस के पास हैं.
पुतिन के इस बयान में उनकी जिद भी थी और इस बात का कबूलनामा भी कि नाटो की सैन्य ताकत अपराजेय है. इसलिए यूक्रेन युद्ध से नाटो को दूर रखने के लिए उन्हें परमाणु युद्ध की चेतावनी देनी पड़ी. हालांकि यूक्रेन युद्ध में नाटो के उतरने से पहले ही यूरोप के देशों पर ही नाटो का खुमार उतर गया.
क्या खत्म हो जाएगा नाटो का वजूद?
चार साल बाद… 11 अप्रैल 2026, नाटो और यूरोपियन यूनियन के सदस्य स्लोवाकिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट फिको परेशान थे. उन्हें नाटो का वजूद खत्म होता नजर आ रहा था. स्लोवाकिया अकेला देश नहीं था, जो नाटो के खत्म होने की आशंका से बेचैन था. ये बेचैनी नाटो के हर सदस्य देश में थी, क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इशारा कर चुके थे कि वो किसी भी दिन नाटो का डेथ वॉरंट जारी कर देंगे.
ट्रंप इस बात से भड़के हुए थे कि ईरान के खिलाफ युद्ध में नाटो उनके कहने के बावजूद शामिल क्यों नहीं हुआ? इसके बाद 6 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा, नाटो पेपर टाइगर है. हमें नाटो की मदद की जरूरत नहीं है. ट्रंप ने पहली बार नाटो के खिलाफ बयान नहीं दिया था. वो आए दिन नाटो को बेइज्जत कर रहे थे, लेकिन नाटो को कागजी शेर बताकर उन्होंने सीधे-सीधे नाटो के सदस्य देशों की गैरत को ललकारा था. राष्ट्रपति ट्रंप का ये बयान नाटो को चुभ गया कि अमेरिका के बिना नाटो क्या ही कर लेगा?
नाटो महासचिव मार्क रुटे भी सच्चाई कबूल कर चुके हैं कि पुराने वाले नाटो के दिन खत्म हो जाएगा. यूरोप को अपनी सुरक्षा की लड़ाई खुद लड़नी होगी, ये बात जर्मनी और ब्रिटेन भी समझ चुके थे. उन्हें रूस से डर था. चिंता भी थी कि अमेरिका से मदद बंद होने के बाद यूक्रेन युद्ध का क्या होगा. इसलिए ब्रिटेन और जर्मनी ने अमेरिका के बिना अपना फ्यूचर वॉर प्लान भी बता दिया.
नाटो से अमेरिका निराश, ट्रंप नाराज
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही यूरोप के ज्यादातर देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका और नाटो पर निर्भर थे, लेकिन अब वो अमेरिका से नाउम्मीद हो चुके थे. यूरोप के देश मान चुके थे कि नाटो अब जिंदा भी रहेगा, तो सिर्फ कागजों में. वैसे दुनिया के तमाम रणनीतिक विश्लेषकों को पहले ही दिख चुका था कि नाटो अब मर चुका है.
नाटो के बिना यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए क्या करेगा, इस पर वॉल स्ट्रीट जर्नल में रिपोर्ट छपी है. इस रिपोर्ट का निचोड़ भी भी यही था कि नाटो के सदस्य देशों को अमेरिका से उम्मीद नहीं है. उसी रिपोर्ट की सच्चाई पर नाटो के पूर्व महासचिव येन्स स्टोल्टेनबर्ग ने भी मुहर लगा दी..
नाटो पर ट्रंप की टेढ़ी नजर पैसों की वजह से शुरू हुई. अब जब नाटो के सदस्य अपना डिफेंस खर्च बढ़ा रहे हैं, तो ट्रंप नाटो से अलग होने की राह पर हैं.
नाटो को ट्रंप का अल्टीमेटम
डोनाल्ड ट्रंप जब चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, तब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि ट्रंप की नजर में पूरी दुनिया रियल इस्टेट है. वो सिर्फ पैसे का खेल समझते हैं. नाटो के बारे में ट्रंप की राय भी सीधे-सीधे पैसों से ही जुड़ी हुई है. अपने पहले कार्यकाल में ही ट्रंप ने नाटो को अल्टीमेटम दे दिया था कि वो अपनी सुरक्षा के लिए पैसे खर्च करें. नाटो के सदस्य देशों ने अपना डिफेंस बजट भी बढ़ाना शुरू कर दिया फिर ट्रंप ने नाटो की नाक में दम क्यों कर दिया.
नाटो पर ट्रंप की टेढ़ी नजर पैसों की वजह से शुरू हुई. अब जब नाटो के सदस्य अपना डिफेंस खर्च बढ़ा रहे हैं, तो ट्रंप नाटो से अलग होने की राह पर हैं.
डोनाल्ड ट्रंप जब चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, तब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि ट्रंप की नजर में पूरी दुनिया रियल इस्टेट है. वो सिर्फ पैसे का खेल समझते हैं. नाटो के बारे में ट्रंप की राय भी सीधे-सीधे पैसों से ही जुड़ी हुई है. अपने पहले कार्यकाल में ही ट्रंप ने नाटो को अल्टीमेटम दे दिया था कि वो अपनी सुरक्षा के लिए पैसे खर्च करें. नाटो के सदस्य देशों ने अपना डिफेंस बजट भी बढ़ाना शुरू कर दिया. फिर ट्रंप ने नाटो की नाक में दम क्यों कर दिया? आइए जानें इसके पीछे की क्या वजह है-
जानें क्या है ट्रंप का 1987 का प्लान
अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल का अंतिम चरण चल रहा था. जापान के प्रधानमंत्री नाकासोने वाशिंगटन डीसी की यात्रा पर थे. एशिया में अमेरिका की कूटनीति और रणनीति का सबसे बड़ा पार्टनर जापान था, इसलिए जापान के पीएम की अमेरिका यात्रा में कुछ भी असामान्य नहीं था.
पांच महीने बाद..अक्टूबर 1987 में सऊदी अरब के किंग फहद बिन अब्दुल अजीज का अमेरिका दौरा था. ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद पश्चिम एशिया में अमेरिका की रणनीति का सबसे बड़ा केंद्र सऊदी अरब ही था. सऊदी किंग की ये यात्रा भी सामान्य कूटनीति के लिए ही थी, लेकिन, जापान के पीएम और सऊदी किंग फहद की यात्राओं के बीच अमेरिका की राजनीति में एक असामान्य घटना हुई. रिपब्लिकन पार्टी की सरकार थी और अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के ही नए-नए नेता बने डोनाल्ड ट्रंप ने अखबारों में इश्तहार छपवा कर रोनाल्ड रीगन की विदेश नीति को बकवास बताना शुरू कर दिया
ट्रंप उस समय राष्ट्रपति बनने का ख्वाब देख रहे थे. इसलिए उनका ये बयान बहुत अहम था. ये संकेत था कि ट्रंप अमेरिका की विदेश नीति 180 डिग्री पलटना चाहते हैं. अमेरिका के राजनीतिक विश्लेषकों ने ट्रंप की खिल्ली भी उड़ाई कि वो कूटनीति और रणनीति में भी पैसे का ही खेल देखते हैं.
सबको यही लगा कि अगर ट्रंप गलती से भी व्हाइट हाउस के गलियारों में पहुंच गए, तो उनको समझ में आ जाएगा कि डिप्लोमेसी और रियल इस्टेट कारोबार में क्या फर्क होता है. ट्रंप ने उन सभी राजनीतिक विश्लेषकों को गलत साबित कर दिया. राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने सबसे पहले उस सैन्य गठबंधन को टारगेट किया, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा था. उसका नाम था नाटो और अब नाटो को लेकर हाल में ट्रंप द्वारा दिए गए बयानों से साफ हो गया है कि उनकी असली मंशा क्या है?
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