Local & National News in Hindi
ब्रेकिंग
Parliament Question Hour Analysis: संसद के लाखों सवालों में आम जनता के मुद्दे कहां? जानिए गरीबी और ज... Maharashtra Voter List SIR 2026: वोटर लिस्ट से नाम हटाने से पहले BLA को देनी होगी सूची, चुनाव आयोग क... RSS Chief Mohan Bhagwat: अतिवाद से परेशान है दुनिया, भारत के पास है ज्ञान का खजाना; अखिल भारतीय विहा... Tamil Nadu Language Dispute: सथानकुलम में दिशा-निर्देश बोर्ड से मिटाए गए हिंदी शब्द, भारी विरोध के ब... Ozone Urbana Scam: बेंगलुरु में होम बायर्स से 927 करोड़ की ठगी, ओजोन ग्रुप के CMD एस. वासुदेवन गिरफ्... Manori Beach News: स्पीडबोट से विदेशी जहाज में चोरी करने घुसे थे बदमाश, गैस रिसाव से 4 की मौत; हेलीक... यूपी की 11 MLC सीटों पर भाजपा का चुनावी चक्रव्यूह: 23 अक्टूबर को मतदान, सामाजिक समीकरणों पर जोर Ramnagar Road Accident: नैनीताल घूमने निकले नेशनल बास्केटबॉल प्लेयर यतीश यादव की सड़क हादसे में मौत,... दिल्ली के 736 पार्कों का सुरक्षा ऑडिट पूरा: उपराज्यपाल के निर्देश पर DDA ने 3 श्रेणियों में बांटे पा... वृंदावन आश्रम पर गहराया विवाद: शिष्य की संदिग्ध मौत के बीच हाथरस का युवक 3 महीने से लापता

Indian Heritage: भारत की संस्कृति और ज्ञान का अनमोल भंडार हैं पांडुलिपियां; जानें क्यों जरूरी है इनका संरक्षण

रायपुर: भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा के लिए विश्वभर में जाना जाता है, जिसका एक बड़ा आधार हमारी प्राचीन पांडुलिपियां (Manuscripts) हैं। सदियों पुराने इन दस्तावेजों में न केवल राजनीतिक और सामाजिक इतिहास दर्ज है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों की बुद्धिमत्ता के भी प्रमाण हैं। लेकिन वर्तमान में, सही संरक्षण के अभाव में यह अनमोल विरासत विलुप्त होने की कगार पर है।

इतिहासकारों की चेतावनी: ज्ञान परंपरा का भंडार है पांडुलिपि

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र के अनुसार, पांडुलिपि केवल कागज के टुकड़े नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति का अक्षय भंडार है। प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं और साहित्यकारों द्वारा इन्हें ताड़पत्र, भोजपत्र, कागजी लुगदी और ताम्रपत्र पर विशेष लिपि और सजावट के साथ तैयार किया जाता था। इनमें कहीं काले अक्षरों का प्रयोग होता था, तो कहीं सोने की पॉलिश से किनारों को सुसज्जित किया जाता था।

क्या हैं पांडुलिपियों के संरक्षण के मुख्य खतरे?

छत्तीसगढ़ में 14 रजवाड़ों और 36 जमीदारियों के इतिहास को खंगालते हुए डॉ. मिश्र ने कई चौंकाने वाले तथ्य साझा किए हैं:

  • विसर्जन की गलत परंपरा: लोग अक्सर इन्हें कबाड़ समझकर या पितृपक्ष के दौरान नदियों और तालाबों में विसर्जित कर देते हैं।

  • प्राकृतिक क्षरण: दीमक, चूहों का काटना और आग लगने जैसी घटनाओं से यह अनमोल ज्ञान नष्ट हो रहा है।

  • अज्ञानता: आम लोगों में इन दस्तावेजों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कीमत की जानकारी न होने से इन्हें फेंक दिया जाता है।

ताड़पत्र से ताम्रपत्र तक: एक गौरवशाली सफर

इतिहासकार डॉ. मिश्र बताते हैं कि भारत में ज्ञान को सुरक्षित रखने की तकनीक का क्रमिक विकास हुआ है:

  1. भोजपत्र: सबसे शुरुआती लेखन माध्यमों में से एक।

  2. ताड़पत्र (Palm Leaves): विशेष रूप से दक्षिण भारत और ओडिशा (उड़िया भाषा) में इनका व्यापक उपयोग हुआ। ज्योतिष विद्या से संबंधित अधिकांश ज्ञान इन्हीं पर सुरक्षित है।

  3. ताम्रपत्र (Copper Plates): इनकी उपयोगिता यह थी कि ये दीमक और आग से सुरक्षित रहते थे। मध्यकाल में सम्मान स्वरूप दी जाने वाली ‘सनद’ भी संस्कृत की मुढ़ीलिपि में ताम्रपत्र पर लिखी जाती थी।

संरक्षण की सख्त जरूरत

आज की तारीख में, पांडुलिपियों का संरक्षण इसलिए भी अनिवार्य है क्योंकि इनसे मिलने वाली जानकारी के बिना हमारा इतिहास अधूरा है। डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र का कहना है कि सरकार और समाज को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। यदि हमने समय रहते इन पांडुलिपियों को संरक्षित और संवर्धित नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ी के लिए हमारा सैकड़ों साल पुराना ज्ञान हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएगा।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.