धार्मिक डेस्क: मुहर्रम, इस्लामिक हिजरी कैलेंडर का पहला महीना है, जो दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र और भावुक महत्व रखता है। यह महीना इस्लामिक नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक भी है। हालांकि, मुहर्रम के पहले 10 दिन गम और मातम के माने जाते हैं, क्योंकि यह वह समय है जब इराक के कर्बला में पैगंबर मोहम्मद साहब के नाती इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ शहादत दी थी। इस दौरान दुनिया भर में मजलिस, नौहा और मातम के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
🕌 क्या होता है ताजिया और इसका महत्व?
मुहर्रम की परंपराओं में ‘ताजिया’ सबसे प्रमुख प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक ढांचा नहीं, बल्कि इमाम हुसैन के कर्बला स्थित मकबरे का एक प्रतीकात्मक मॉडल (प्रतिकृति) है। इसे बांस, कागज, लकड़ी, धातु और अन्य सजावटी सामग्री से बेहद खूबसूरती से तैयार किया जाता है। मुहर्रम की पहली तारीख या उससे पूर्व इसे घरों, इमामबाड़ों और अजाखानों में लाया जाता है। आशूरा (10वीं मुहर्रम) के दिन इसे तय स्थान तक ले जाया जाता है या दफन किया जाता है।
🕯️ ताजिया निकालने की परंपरा
मुहर्रम के दौरान अधिकांश धार्मिक आयोजन ताजिये के आसपास ही केंद्रित होते हैं। अजाखानों में शोक सभाएं (मजलिस) आयोजित की जाती हैं, जहाँ कर्बला की घटनाओं का स्मरण किया जाता है। लोग “या हुसैन” की सदाएं बुलंद करते हैं और इमाम हुसैन की शहादत को याद कर अपना दुख व्यक्त करते हैं। ताजिया जुलूस इस शहादत के प्रति सम्मान और याद को जीवित रखने का एक जरिया है।
📅 आशूरा का महत्व
मुहर्रम का सबसे महत्वपूर्ण दिन ‘आशूरा’ (10वीं मुहर्रम) को माना जाता है। इस दिन दुनिया भर के मुसलमान इमाम हुसैन के बलिदान को याद करते हैं और उपवास तथा दान जैसे कार्यों में भी शामिल होते हैं। भारत में मुहर्रम की तारीखों को लेकर स्थानीय चांद देखने की परंपरा के अनुसार कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
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