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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में अस्मिता डे का ऐतिहासिक कारनामा, जूडो में भारत को दिलाया पहला महिला गोल्ड

ग्लासगो/नई दिल्ली: कॉमनवेल्th गेम्स 2026 (CWG 2026) में शुक्रवार 31 जुलाई का दिन भारतीय जूडो के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया।

दक्षिण त्रिपुरा के छोटे से कस्बे बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता डे ने महिलाओं की 48 किलोग्राम जूडो कैटेगरी के रोमांचक फाइनल मुकाबले में कनाडा की हाइडी क्वाक को ‘गोल्डन स्कोर’ में हराकर गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। इसके साथ ही अस्मिता कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो इवेंट के अंतर्गत भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बन गईं। हालांकि, त्रिपुरा के बेलोनिया से ग्लासगो के पोडियम तक पहुंचने का अस्मिता का यह सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा है।

🏃‍♂️ 800 मीटर रेस से की थी शुरुआत, कोच की सलाह पर अपनाया जूडो का रास्ता

दिलचस्प बात यह है कि अस्मिता का खेल करियर शुरुआत से जूडो में नहीं था।

साल 2015 में त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिला लेने के दौरान उन्होंने 800 मीटर रेस से अपने एथलेटिक करियर का आगाज किया था। हालांकि, उनकी शारीरिक क्षमता और फुर्ती को देखते हुए कोच की सलाह पर उन्होंने जूडो खेल को अपनाया। इसके बाद बेलोनिया विद्यापीठ कोचिंग सेंटर की बीना देबनाथ और त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल के कोच माणिक लाल देब ने उनकी शुरुआती तकनीकों को तराशा।

नेशनल स्कूल गेम्स और खेलो इंडिया में शानदार प्रदर्शन के दम पर उनका चयन भोपाल स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के लिए हुआ, जहां उन्होंने साई रीजनल सेंटर में दिग्गज जूडो कोच यशपाल सोलंकी के मार्गदर्शन में अपने खेल को निखारा। वह भारतीय जूडो टीम में जगह बनाने वाली त्रिपुरा की पहली महिला खिलाड़ी भी हैं।

💪 आर्थिक तंगी और ताशकंद ग्रैंड स्लैम न जा पाने का दर्द, फिर भी नहीं मानी हार

अस्मिता का पारिवारिक बैकग्राउंड काफी आर्थिक संघर्षों से भरा रहा है।

उनके पिता बेलोनिया में साइकिल मरम्मत की एक छोटी सी दुकान चलाते थे। साल 2023 में ताशकंद ग्रैंड स्लैम में हिस्सा लेने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे तक नहीं थे और राज्य सरकार से गुहार लगाने के बावजूद फंड की कमी के कारण वह उसमें हिस्सा नहीं ले सकी थीं। लेकिन इन तमाम आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद अस्मिता डे ने कभी हिम्मत नहीं हारी।

कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने से पहले भी अस्मिता ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का नाम रोशन किया है। उन्होंने 2022 एशियन कैडेट एवं जूनियर जूडो चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल, 2023 कुवैत एशियन ओपन में सिल्वर मेडल, जूनियर एशियन कप में गोल्ड मेडल और 2025 कासाब्लांका अफ्रीकन ओपन में भी गोल्ड मेडल हासिल किया था।

🕯️ दिसंबर 2025 में पिता का साया उठा, भावुक होकर बोलीं- ‘यह गोल्ड पिता के नाम’

उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2025 में अस्मिता के पिता का असामयिक निधन हो गया था, जिससे वह मानसिक रूप से पूरी तरह टूट गई थीं।

इसके बावजूद उन्होंने गजब की खेल भावना दिखाते हुए केवल दो महीने बाद आयोजित एशियन गेम्स ट्रायल्स में नेशनल स्तर पर पहली रैंक हासिल कर धमाकेदार वापसी की।

कॉमनवेल्थ गेम्स में ऐतिहासिक गोल्ड मेडल जीतने के बाद अस्मिता डे काफी भावुक नजर आईं। उन्होंने कहा, “यह पदक जीतकर मैं बेहद खुश हूं। यह पदक मेरे लिए, मेरे राज्य त्रिपुरा और पूरे देश के लिए बहुत अहम था। मैं इस उपलब्धि को अपने कोच और अपने दिवंगत पिता को समर्पित करती हूं। दिसंबर 2025 में जब मेरे पिता का निधन हुआ, तो मुझे लगा कि मेरा सब कुछ खत्म हो गया है, क्योंकि वह मेरे सबसे बड़े सपोर्टर थे। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और आज उनका सपना पूरा किया।”

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