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आईआईटी धनबाद के शोधकर्ताओं का कमाल: 80% फ्लाई ऐश और 20% प्लास्टिक से बनाया FPA, अंडरग्राउंड माइंस होगी सुरक्षित

धनबाद (झारखंड): खदानों में खनन के पश्चात बैकफिलिंग (खाली स्थान भरने) के लिए प्राकृतिक बालू (सैंड) पर बढ़ती निर्भरता और उसकी किल्लत के बीच आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के वैज्ञानिकों ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।

संस्थान के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. भंवर सिंह चौधरी के कुशल नेतृत्व में रिसर्च टीम ने फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरे (वेस्ट) के अनूठे मिश्रण से एक ऐसा पर्यावरण अनुकूल मटेरियल तैयार किया है, जिसका उपयोग अंडरग्राउंड माइंस में खाली जगहों को सुरक्षित रूप से भरने के लिए किया जा सकता है।

🔬 पोलैंड के वैज्ञानिकों के सहयोग से विकसित हुआ ‘FPA’, दो बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं का एक साथ समाधान

पोलैंड के अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के सहयोग से विकसित किए गए इस विशेष मटेरियल को ‘फ्लाई ऐश-प्लास्टिक एग्रीगेट’ (Fly Ash-Plastic Aggregate) यानी FPA नाम दिया गया है।

इस नवाचार की सबसे खास बात यह है कि इसके जरिए एक साथ दो बड़ी वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत किया गया है। एक तरफ कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाली फ्लाई ऐश का निस्तारण बेहद गंभीर चुनौती बना हुआ है, तो वहीं दूसरी तरफ प्लास्टिक कचरा पर्यावरण और जल निकायों पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है।

⚙️ 80% फ्लाई ऐश और 20% HDPE प्लास्टिक के थर्मल प्रोसेस से बना FPA, मिनिस्ट्री ऑफ कोल से फंडेड है प्रोजेक्ट

शोधकर्ताओं ने 80 प्रतिशत फ्लाई ऐश और 20 प्रतिशत हाई डेंसिटी पॉलीएथिलीन (HDPE) प्लास्टिक वेस्ट को विशेष थर्मल प्रोसेस के माध्यम से मिलाकर FPA तैयार किया है।

कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) द्वारा वित्तपोषित इस प्रोजेक्ट पर प्रो. भंवर सिंह चौधरी और उनके रिसर्च स्कॉलर डॉ. मुनिपाला मनोहर ने गहन शोध किया है। उल्लेखनीय है कि भूमिगत खनन के दौरान कोयला या अयस्क निकालने के बाद जमीन के नीचे विशाल खाली गुहाएं (वॉइड्स) बन जाती हैं। इन्हें भरने के लिए दशकों से प्राकृतिक नदियों की बालू का उपयोग किया जा रहा है, किंतु निर्माण और खनन के विस्तार से बालू की भारी कमी हो गई है, ऐसे में FPA इसका सबसे बेहतरीन और टिकाऊ विकल्प बनकर उभरा है।

💪 प्रयोगशाला परीक्षणों में अत्यधिक मजबूत व टिकाऊ साबित हुआ FPA, स्लरी पाइपलाइन से खदानों में भेजना आसान

प्रयोगशाला परीक्षणों (Lab Tests) में FPA ने कई ऐसे अद्वितीय गुण प्रदर्शित किए हैं, जो इसे माइन बैकफिलिंग के लिए बेहद उपयोगी सिद्ध करते हैं।

शोध के निष्कर्षों के अनुसार, यह मटेरियल अत्यधिक मजबूत और टिकाऊ होने के साथ-साथ जल निकासी (Water Drainage) में भी काफी मददगार है। प्राकृतिक सैंड की तुलना में इसका घनत्व और वजन कम होने के कारण इसे पानी के साथ घोलकर (स्लरी पाइपलाइन) के जरिए भूमिगत खदानों की गहराई तक पहुँचाना बेहद आसान और किफायती होगा।

🧱 खुरदरी सतह से मिलेगी बेहतर इंटरलोकिंग, हाइड्रोलिक स्टोइंग और माइन सेफ्टी में साबित होगा मील का पत्थर

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपिक जांच में FPA के कणों की सतह खुरदरी और कोणीय (Angular) पाई गई है।

इस विशेष बनावट की वजह से इसके कण एक-दूसरे के साथ आपस में बेहतर तरीके से इंटरलॉक (Interlock) हो जाते हैं, जिससे बैकफिलिंग के बाद भूमिगत क्षेत्र की संरचनात्मक स्थिरता में कई गुना वृद्धि होती है। अत्यधिक दबाव संबंधी परीक्षणों में भी इस मटेरियल ने उत्कृष्ट प्रतिरोध क्षमता दर्ज की है। भविष्य में इसका इस्तेमाल हाइड्रोलिक स्टोइंग (Hydraulic Stowing) के दौरान प्राकृतिक बालू और सामान्य फ्लाई ऐश के विकल्प के रूप में करके खदानों को धंसने से बचाया जा सकेगा।

🌐 पोलैंड के एजीएच यूनिवर्सिटी और पोलिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिकों ने किया अंतरराष्ट्रीय सहयोग

इस प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्र और तकनीक के विकास में पोलैंड के एजीएच यूनिवर्सिटी ऑफ क्राकोव के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. क्रिजिस्तोफ स्क्रिप्कोव्स्की, मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. क्रिजिस्तोफ जागोर्स्की तथा पोलिश एकेडमी ऑफ साइंसेज की इंस्टीट्यूट ऑफ जियोलॉजिकल साइंसेज से डॉ. अन्ना जागोर्स्का ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया है।

🌱 ‘पर्यावरणीय बोझ माने जाने वाले कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलना ही हमारा लक्ष्य’— प्रो. भंवर सिंह चौधरी

विभागाध्यक्ष प्रो. भंवर सिंह चौधरी के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट का मुख्य ध्येय उस औद्योगिक कचरे को एक बेहद उपयोगी संसाधन में परिवर्तित करना है, जिसे अब तक पर्यावरण के लिए केवल एक बोझ माना जाता रहा है।

“यह तकनीक नदियों से प्राकृतिक बालू के अंधाधुंध दोहन को रोकने के साथ-साथ थर्मल पावर प्लांटों के फ्लाई ऐश और प्लास्टिक कचरे का शत-प्रतिशत वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करेगी।”

प्रो. भंवर सिंह चौधरी, विभागाध्यक्ष (माइनिंग), IIT (ISM) धनबाद

👨‍🔬 जानिए कौन हैं अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोधकर्ता प्रो. भंवर सिंह चौधरी

प्रो. भंवर सिंह चौधरी वर्तमान में देश के शीर्ष संस्थान आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख हैं।

उन्होंने वर्ष 1998 में प्रतिष्ठित एमबीएम (MBM) इंजीनियरिंग कॉलेज, जोधपुर से माइनिंग में बीई की पढ़ाई पूरी की। इसके पश्चात उन्होंने माइन प्लानिंग में एम.टेक और आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी से रॉक ब्लास्टिंग विषय में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनके पास माइनिंग इंडस्ट्री का 6 वर्षों से अधिक का व्यावहारिक अनुभव है और उनके 100 से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले इंटरनेशनल रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं। उनके मुख्य शोध क्षेत्रों में माइन प्लानिंग, रॉक ब्लास्टिंग, टनलिंग और अंडरग्राउंड माइनिंग टेक्नोलॉजी शामिल हैं। निष्कर्षतः, जिस कचरे को हम पर्यावरण के लिए अभिशाप समझते थे, वही अब खदानों की सुरक्षा का रक्षा-कवच बनेगा।

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