छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तेंदूपत्ता कारोबारियों से 2% ABS वसूली वैध, जैव विविधता बोर्ड के आदेश के खिलाफ याचिकाएं खारिज
बिलासपुर (छत्तीसगढ़): छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने तेंदूपत्ता फॉरेस्ट लॉट की सरकारी नीलामी में खरीद और जैव विविधता संरक्षण को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने तेंदूपत्ता कारोबारियों से खरीद मूल्य का 2 प्रतिशत ‘एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग’ (ABS) राशि वसूलने के राज्य जैव विविधता बोर्ड (State Biodiversity Board) के आदेश को पूरी तरह वैध और न्यायसंगत ठहराया है। माननीय न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए कारोबारियों और व्यापारियों द्वारा इस वसूली के विरुद्ध दायर सभी रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया है।
📜 कारोबारियों ने दी थी बोर्ड के आदेश को चुनौती, सीधे संग्राहकों से न खरीदने का दिया था तर्क
यह पूरा विवाद राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा 24 जनवरी 2023 को जारी आदेश और 25 जनवरी 2023 को प्रेषित आधिकारिक पत्र से जुड़ा था।
इन निर्देशों के तहत तेंदूपत्ता फॉरेस्ट लॉट के सफल बोलीदाताओं से कुल खरीद मूल्य का 2 प्रतिशत ABS शुल्क के रूप में जमा कराने की व्यवस्था अनिवार्य की गई थी। कारोबारियों ने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि वे सीधे वनवासियों अथवा प्राथमिक संग्राहकों से तेंदूपत्ता नहीं खरीदते, बल्कि राज्य सरकार की वैधानिक व्यवस्था के तहत खुली सार्वजनिक नीलामी में हिस्सा लेकर फॉरेस्ट लॉट क्रय करते हैं।
📖 1964 अधिनियम का दिया था हवाला, कहा- प्राथमिक संग्राहकों से सीधा लेन-देन नहीं
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि तेंदूपत्ता का व्यापार और संग्रहण पूर्व से ही ‘छत्तीसगढ़ तेंदूपत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1964’ के तहत पूर्णतः नियंत्रित है।
व्यापारियों का कहना था कि राज्य सरकार और उसकी अधिकृत प्राथमिक वनोपज समितियां वनवासियों से तेंदूपत्ता एकत्र कर खरीदती हैं और उसके उपरांत लॉट बनाकर नीलामी की जाती है। चूंकि कारोबारियों का जमीनी संग्राहकों से सीधा कोई आर्थिक लेन-देन नहीं रहता, इसलिए उन पर जैव विविधता बोर्ड द्वारा 2 प्रतिशत की अतिरिक्त ABS राशि थोपना अनुचित और गैरकानूनी है।
🏛️ हाईकोर्ट ने खारिज किए व्यापारियों के तर्क, कहा- दोनों कानून एक-दूसरे के पूरक
उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता कारोबारियों की इन दलीलों को सिरे से अस्वीकार कर दिया।
अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि वर्ष 1964 का राज्य कानून मुख्य रूप से तेंदूपत्ता के संग्रहण, खरीद, परिवहन और व्यापारिक ढांचे को नियंत्रित करता है, जबकि ‘जैविक विविधता अधिनियम, 2002’ (Biological Diversity Act, 2002) का मूल उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का संवहनीय (सतत) उपयोग और उनके व्यावसायिक दोहन से प्राप्त लाभ का स्थानीय समुदायों के बीच न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है। अदालत ने रेखांकित किया कि दोनों अधिनियम अलग-अलग अधिकार क्षेत्रों में कार्य करते हुए एक-दूसरे के पूरक हैं।
🌲 सरकारी नीलामी से खरीदार ABS की वैधानिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं: अदालत
माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल सरकारी नीलामी के जरिए तेंदूपत्ता क्रय करने मात्र से कोई भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान ABS की वैधानिक देनदारी से मुक्त नहीं हो जाता।
तेंदूपत्ता एक प्रमुख जैविक/जैव संसाधन है और इसका कोई भी व्यावसायिक उपयोग सीधे तौर पर ‘जैविक विविधता अधिनियम, 2002’ के दायरे में आता है। अतः राज्य जैव विविधता बोर्ड को कानून के अंतर्गत निर्धारित 2 प्रतिशत राशि की वसूली का पूर्ण विधिक अधिकार प्राप्त है।
📜 वन अधिकार अधिनियम 2006 का उल्लेख, पूर्वव्यापी कार्रवाई का आरोप भी हुआ खारिज
फैसले में उच्च न्यायालय ने ‘वन अधिकार अधिनियम, 2006’ (Forest Rights Act, 2006) के महत्वपूर्ण प्रावधानों का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि तेंदूपत्ता ‘लघु वनोपज’ (Minor Forest Produce) की श्रेणी में आता है और कानून वनवासी व आदिवासी समुदायों को इसके संग्रहण, सतत उपयोग और निपटान का बुनियादी अधिकार प्रदान करता है। इसके साथ ही कारोबारियों द्वारा ABS वसूली को पूर्वव्यापी (बैकडेट) कार्रवाई बताने के तर्क को भी खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों ने कोई नया कर या शुल्क नहीं लगाया, बल्कि पूर्व से लागू वैधानिक प्रावधानों का ही क्रियान्वयन किया है।
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