Local & National News in Hindi
ब्रेकिंग
Swami Avimukteshwaranand on Gen Z: सादगी और मासूमियत ने दिला दिया मंत्री से इस्तीफा, मुख्य चुनाव आयु... Dewas Naka Flyover Indore: जाम से मिलेगी राहत, दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 तक शुरू होने की संभावना MP Shujalpur Incident: चौबे मार्ग पर डीजे के कंपन से गिरा पैतृक मकान का हिस्सा, शांति समिति के नियमो... Bhojshala Satyagrah Dhar: संत समाज हिंदू आस्था के इस केंद्र के लिए पूरी तरह समर्पित, मां सरस्वती की ... UPI ट्रांजैक्शन पर 0.4% MDR चार्ज का विरोध: 2 अक्टूबर को 'नो UPI डे' मनाने की तैयारी में मोबाइल रिटे... Shahdol News: बिजली कटने से नाराज युवक शराब के नशे में ट्रांसफॉर्मर पर चढ़ा, सब-स्टेशन में मचाया जमक... Bilaspur News: मस्तूरी के स्कूल में बड़ा हंगामा, लेक्चरर ने प्रिंसिपल से की गाली-गलौज और जान से मारन... Ujjain Simhastha 2028: विकास कार्यों के लिए सीएम मोहन यादव ने खुद तोड़ा अपना पैतृक मकान, कहा- जनहित ... Ganesh Visarjan Accident Bhind: भारी बारिश के बीच नदी में फिसले पैर, एनडीआरएफ की टीम भी अब तक नहीं ढ... MPPSC Success Story: असफलता से हार नहीं मानी, 5 बार नेट क्वालीफाई कर राजीव कुशवाहा ने हासिल किया मुक...

Purnima Shradh 2026: पूर्णिमा श्राद्ध आज, शाम को पितरों के निमित्त कितने दीपक जलाएं? जानिए सही दिशा और नियम

हिंदू पंचांग के अनुसार, आज 26 सितंबर 2026, शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध संपन्न किया जा रहा है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से ही पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्मों की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। हालांकि, पितृपक्ष की मुख्य श्राद्ध तिथियां 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध से प्रारंभ होंगी।

इस पावन अवधि में लोग अपने पितरों एवं पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध और दान-पुण्य के कार्य करते हैं। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं में श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों के लिए दीपदान करने की विशेष परंपरा बताई गई है। दीपक को अंधकार दूर करने, प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए शाम के समय पितरों के निमित्त दीप प्रज्वलित करने का विशेष विधान है।

🕯️ पूर्णिमा श्राद्ध पर कितने दीपक जलाएं? 16 तिथियों से जुड़ा है दीपदान का विधान

दीपदान की संख्या और मान्यताएं:

  • 16 दीपकों की परंपरा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा श्राद्ध की शाम को पितरों के नाम पर 16 दीपक जलाने की परंपरा मानी जाती है। यह 16 दीपक पितृपक्ष की 16 प्रमुख श्राद्ध तिथियों और पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक माने जाते हैं।

  • श्रद्धा अनुसार विकल्प: यदि किसी कारणवश घर में 16 दीपक जलाना संभव न हो, तो श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य, सुविधा और श्रद्धा के अनुसार एक, तीन या पांच दीपक भी जला सकते हैं।

🧭 किस दिशा में जलाएं दीपक? दक्षिण दिशा का विशेष महत्व

दीपदान की सही दिशा और नियम:

  • पितरों की दिशा: धार्मिक एवं वास्तु मान्यताओं के अनुसार, दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना जाता है। इसलिए पितरों के निमित्त जलाया जाने वाला दीपक हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखने की परंपरा है।

  • स्मरण और प्रार्थना: शाम के समय घर के किसी स्वच्छ स्थान अथवा मुख्य द्वार के पास दक्षिण दिशा में दीपक प्रज्वलित कर पितरों का ध्यान करें। दीपक जलाते समय मन ही मन अपने पूर्वजों का स्मरण करें और उनकी आत्मा की शांति एवं परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करें।

📜 पूर्णिमा श्राद्ध और पितृपक्ष का क्या है संबंध? प्रतिपदा से चलेगा मुख्य तिथियों का क्रम

तिथियों की व्यवस्था और परंपराएं:

  • श्राद्ध कर्म की शुरुआत: भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध पितरों के निमित्त आरंभ होने वाले धार्मिक कर्मों की पहली कड़ी माना जाता है। इसके पश्चात आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से मुख्य पितृपक्ष का क्रम आगे बढ़ता है।

  • तिथि अनुसार श्राद्ध: जिस परिजन या पूर्वज का देहावसान जिस तिथि को हुआ हो, पितृपक्ष में उसी तिथि के दिन उनका तर्पण और श्राद्ध करने का नियम है।

  • पुण्य कार्य: इस अवधि में जल से तर्पण, तिल-जौ से पिंडदान, योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराने और निर्धनों को सामर्थ्य अनुसार वस्त्र व अन्न दान देने की परंपरा निभाई जाती है।

🕊️ पितृपक्ष का धार्मिक महत्व: पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और आशीर्वाद का पर्व

आस्था और आध्यात्मिक मान्यता:

  • सच्ची श्रद्धा का प्रतीक: हिंदू धर्म में पितृपक्ष केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने, उनके उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके प्रति सम्मान जताने का पावन अवसर है।

  • सुख-शांति की प्राप्ति: मान्यता है कि विधि-विधान और शुद्ध अंतःकरण से किए गए श्राद्ध कर्मों से पूर्वजों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। प्रसन्न होकर पितृ अपने कुल को सुख, शांति, वंश वृद्धि और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

  • दान-पुण्य का फल: पितृपक्ष में जरूरतमंदों की सेवा करना और उन्हें भोजन कराना सर्वोत्तम पुण्य कर्म माना गया है।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.