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अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रचंड जीत, अमेरिकी संसद के दोनों सदनों पर हुआ कब्जा

वाशिंगटन: संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए महत्वपूर्ण मिडटर्म (मध्यवर्ती) चुनावों के परिणाम सामने आ चुके हैं, जिसमें डेमोक्रेटिक पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी जीत हासिल की है। अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की कुल 435 सीटों पर हुए चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने 228 सीटों पर धमाकेदार जीत दर्ज की है, जबकि विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी को 139 सीटों से संतोष करना पड़ा है। इसी तरह, सीनेट की कुल 100 सीटों में से इस बार 35 सीटों पर चुनाव संपन्न हुए, जिनमें डेमोक्रेट्स ने 20 और रिपब्लिकन पार्टी ने 13 सीटें अपने नाम कीं। इन परिणामों के बाद सीनेट में कुल मिलाकर डेमोक्रेटिक पार्टी के पास 54 और रिपब्लिकन पार्टी के पास 44 सीटें हो गई हैं। इस चुनावी नतीजों के साथ ही अमेरिकी संसद के दोनों प्रमुख सदनों पर डेमोक्रेट्स का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के खिलाफ माना जा रहा है जनता का यह फैसला, महंगाई और ईरान युद्ध रहे बड़े चुनावी मुद्दे

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वर्तमान दूसरे कार्यकाल के खिलाफ जनता के कड़े असंतोष और फैसले को दर्शाते हैं। मतदान से पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने खुद मतदाताओं से अपील की थी कि वे इस चुनाव को ऐसा समझें जैसे वह स्वयं मैदान में उतर रहे हों। इस पूरे चुनाव प्रचार के दौरान देश के भीतर आसमान छूती महंगाई, विदेशी सामानों पर लगाए जाने वाले भारी-भरकम टैक्स और ईरान के साथ चल रहे अमेरिका के सैन्य संघर्ष सबसे बड़े और प्रमुख मुद्दे बने रहे। युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ईंधन की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया है। मीडिया रिपोर्ट्स और वोटर पोल के अनुसार, बहुसंख्यक अमेरिकी मतदाता देश की बढ़ती महंगाई के लिए सीधे तौर पर ट्रंप प्रशासन की नीतियों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं और वे चाहते हैं कि संसद राष्ट्रपति के फैसलों पर प्रभावी नियंत्रण और रोक-टोक रखे।

भारत पर क्या पड़ेगा इस राजनीतिक बदलाव का असर? जानिए व्यापार, वीजा और रक्षा सहयोग से जुड़े अहम समीकरण

अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत मिलने से अब डेमोक्रेट्स को नए कानून बनाने, सरकारी बजट व खर्चों पर फैसले लेने तथा राष्ट्रपति के प्रशासनिक कामकाज की गहराई से जांच करने की अधिक विधिनिहित ताकत मिल जाएगी। हालांकि, इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि अमेरिका की संपूर्ण विदेश नीति सीधे तौर पर उनके नियंत्रण में आ जाएगी। राष्ट्रपति ट्रंप के पास अभी भी कई शक्तिशाली संवैधानिक अधिकार सुरक्षित हैं, जिनमें संसद द्वारा पारित किसी भी विधेयक को वीटो (अस्वीकार) करने की ताकत शामिल है। भारत के दृष्टिकोण से देखें तो इस राजनीतिक फेरबदल का असर मुख्य रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों— व्यापार (टैरिफ), एच-1बी वीजा (H-1B Visa) और द्विपक्षीय रक्षा सहयोग पर पड़ सकता है।

टैरिफ और व्यापार नीतियों पर क्या होगा प्रभाव? अंतरिम व्यापार समझौते के मोर्चे पर टिकी हैं भारतीय निर्यातकों की निगाहें

चूंकि संयुक्त राज्य अमेरिका भारतीय उत्पादों और वस्तुओं का एक बहुत बड़ा और प्रमुख बाजार है, इसलिए वहां के कर ढांचे या टैक्स नियमों में होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा असर भारत के व्यापारियों और निर्यातकों पर पड़ता है। बीते फरवरी महीने में भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा पेश किया गया था, जिसके अंतर्गत अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 18 प्रतिशत का जवाबी टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, बाद में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रंप की आपातकालीन शक्तियों के तहत लगाए गए वैश्विक टैक्स को निरस्त कर दिया, जिससे यह कर घटकर शुरुआती 10 प्रतिशत के स्तर पर आ गया था। वर्तमान में दोनों देशों के बीच पूर्ण व्यापार समझौता अभी अंतिम रूप से संपन्न नहीं हुआ है, हालांकि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में संकेत दिए थे कि यह समझौता अपने अंतिम चरण में चल रहा है।

H-1B वीजा नियमों और रक्षा सहयोग पर संसद में बढ़ सकती है चर्चा, विश्लेषकों के अनुसार सीमित रहेगी ट्रंप के फैसलों पर रोक

संसद में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने के कारण आने वाले दिनों में H-1B वीजा के नियमों और शर्तों को लेकर तीखी बहस और संसदीय जांच का दायरा बढ़ सकता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर अमेरिका में कार्यरत भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ सकता है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि वीजा नियमों में रातोंरात कोई बड़ा बदलाव आ जाएगा। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने नए H-1B आवेदनों पर 1 लाख डॉलर की भारी फीस वसूलने का ऐलान किया था, और संसद में डेमोक्रेट्स का बहुमत होने मात्र से यह प्रशासनिक फैसला अपने आप स्वतः समाप्त नहीं हो जाएगा। इसी प्रकार, भारत के साथ रणनीतिक रक्षा सहयोग के मामलों पर भी अमेरिकी संसद में विचार-विमर्श तेज हो सकता है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट का भी यही मानना है कि डेमोक्रेट्स के बहुमत वाली संसद राष्ट्रपति ट्रंप के कड़े फैसलों और नीतियों को रोकने के लिए बहुत सीमित प्रभाव ही डाल पाएगी।

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