February 24, 2026 2:40 pm
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मध्यप्रदेश

मेडिकल जांच के साथ अनिवार्य हो प्रेग्नेंसी टेस्ट, दुष्कर्म मामलों में MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रेप पीड़िताओं के हित में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने कोर्ट डीजीपी यानी कि डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस को निर्देश दिए हैं कि दुष्कर्म की शिकायत प्राप्त होने के बाद पीड़िता की मेडिकल जांच के दौरान ही अनिवार्य रूप से प्रेग्नेंसी टेस्ट भी कराया जाए. हाईकोर्ट ने कहा कि प्रारंभिक चरण में गर्भावस्था की जानकारी मिलने से समय रहते गर्भपात जैसे निर्णय लिए जा सकते हैं, जिससे पीड़िता की जान बचाई जा सकती है.

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि गर्भवती पीड़िता और उसके अभिभावकों की मंशा यदि गर्भपात कराने की हो तो देर करना उनकी जान के लिए घातक साबित हो सकता है. जिसमें खासतौर से नाबालिग पीड़िताओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान रखते हुए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है.

दरअसल मध्यप्रदेश में जब प्रदेश भर में नाबालिग दुष्कर्म पीड़िताओं के गर्भपात से जुड़े कई मामले कोर्ट के समक्ष लंबित हैं. इन मामलों में अक्सर देरी के कारण गर्भ 24 सप्ताह से अधिक हो जाता है जिस स्थिति में भारतीय कानून के अनुसार गर्भपात के लिए हाईकोर्ट की अनुमति आवश्यक होती है. फरवरी 2025 में हाईकोर्ट ने पहले ही एक गाइडलाइन जारी की थी जिसमें कहा गया था कि यदि कोई नाबालिग पीड़िता 24 सप्ताह या उससे अधिक की गर्भवती है तो गर्भपात के लिए हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी.

इस निर्णय का सीधा संबंध सीहोर जिले से आए एक मामले से जुड़ा है. जहां पॉक्सो कोर्ट से होते हुए एक नाबालिग पीड़िता का केस हाईकोर्ट पहुंचा. जांच में पता चला कि पीड़िता का गर्भ 24 सप्ताह से अधिक का है और उसकी मेडिकल रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि गर्भपात कराना भी जोखिमभरा है और गर्भ जारी रखना भी नाबालिग की जान के लिए खतरा बन सकता है. इस मामले में कोर्ट के सामने गंभीर सवाल था कि जान को सुरक्षित रखने का सही रास्ता क्या हो सकता है.

सभी जिलों के एसपी को दिए गए निर्देश

हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश के डीजीपी को आदेश दिया है कि वह राज्य के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को इस निर्णय का पालन सुनिश्चित कराने के लिए तत्काल निर्देश जारी करें. यह स्पष्ट किया गया कि दुष्कर्म पीड़िताओं की जांच प्रक्रिया में अब प्रेग्नेंसी टेस्ट को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए. इससे संबंधित विभागों को भी सहयोग के लिए तैयार रहने को कहा गया है. यह फैसला न सिर्फ पीड़िताओं को न्याय दिलाने की दिशा में अहम कदम है बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र को भी मजबूत करता है.

अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता को गर्भावस्था का देर से पता चलता है और वे जब गर्भपात की अनुमति के लिए आवेदन करते हैं तब तक गर्भ काफी आगे बढ़ चुका होता है. इससे गर्भपात कानूनी और चिकित्सकीय दोनों ही दृष्टियों से कठिन हो जाता है.

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह आदेश एक साहसिक और मानवीय दृष्टिकोण से प्रेरित निर्णय है, जो दुष्कर्म पीड़िताओं के जीवन की रक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए एक नया रास्ता खोलता है। इससे जहां न्याय प्रक्रिया तेज होगी वहीं पीड़िताओं के लिए मानसिक और शारीरिक राहत सुनिश्चित हो सकेगी। अब यह प्रदेश पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी है कि इस आदेश को समय पर, प्रभावी ढंग से लागू करें और दुष्कर्म पीड़िताओं को जल्द न्याय और सुरक्षा प्रदान करें।

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