छत्तीसगढ़ की धरती, गणेश पूजा की अनादि परंपरा और प्राचीन प्रतिमाओं का गढ़: पुरातत्वविद

रायपुर: देश और प्रदेश में गणेश चतुर्थी पर गणपति बप्पा की धूम है. रायपुर से लेकर बस्तर तक भक्त विघ्नहर्ता की भक्ति में डूबे हैं. छत्तीसगढ़ में गणपति पूजा की परंपरा हजारों सालों से चली आ रही है. छत्तीसगढ़ अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है. यही कारण है कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में 5वीं और छठी शताब्दी से लेकर 13वीं और14वीं शताब्दी तक की कई ऐतिहासिक गणेश प्रतिमाएं आज भी विराजमान हैं. कुछ मंदिरों में पूजी जाती है, तो कुछ प्रतिमाएं संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं. इन प्रतिमाओं की विशेषता यह है कि हर कालखंड की कला, स्थापत्य और धार्मिक मान्यताओं की झलक इनमें दिखाई देती है.
ताला की आस गणेश प्रतिमा: सबसे प्राचीन प्रतिमाओं की बात की जाए तो छत्तीसगढ़ की सबसे प्राचीन गणेश प्रतिमा ताला गांव की है, जिसे आस गणेश कहा जाता है. उसके द्वार शाखा में आसनस्य गणेश प्रतिमा विराजमान है. यह सबसे पुरानी प्रतिमा मानी जाती है. जो पांचवी और छठवीं शताब्दी की है. यह प्रतिमा गुप्तकालीन कला का जीवंत उदाहरण है. खास बात यह है कि यह प्रतिमा बैठी हुई मुद्रा में है और इसे सबसे पुरानी गणेश प्रतिमाओं में गिना जाता है.
राजिम की गणेश प्रतिमा, सोमवंशी काल की धरोहर: राजिम जिसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग भी कहा जाता है, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है. यहां स्थापित गणेश प्रतिमा 7वीं और 8वीं शताब्दी की है. इसका संबंध सोमवंशी शासकों से माना जाता है. इस प्रतिमा के भाव और मूर्तिकला उस समय की कला समृद्धि को दिखाते हैं.
डीपाडीह की 116 भुजाओं वाली गणेश प्रतिमा: डीपाडीह में स्थापित 116 भुजाओं वाले गणेश जी की प्रतिमा 9वीं से 11वीं शताब्दी की है. यह प्रतिमा न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत में अनोखी मानी जाती है. इतनी भुजाओं के साथ गणेश जी की प्रतिमा कहीं और नहीं है. ये प्रतिमा अपने आप में खास है.
मल्हार की पंचमुखी गणेश प्रतिमा: कलचुरी काल (10वीं और 11वीं शताब्दी) की मल्हार स्थित पंचमुखी गणेश प्रतिमा ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत दुर्लभ है. छत्तीसगढ़ में यह इकलौती पंचमुखी गणेश प्रतिमा है. इस प्रतिमा की स्थापत्य शैली और चेहरे की अभिव्यक्ति प्राचीन कलाकारों की अदभुत कल्पना को दिखाती है.
बारसूर की ट्विन गणेश प्रतिमा: छिंदकनाग वंश (11वीं-13वीं शताब्दी) के समय निर्मित बारसूर की जुड़वा गणेश प्रतिमा एशिया की सबसे बड़ी मानी जाती है. यह प्रतिमा आज भी विशालता और कला कौशल का अद्भुत उदाहरण माना जाता है. बारसूर को प्राचीन काल में मंदिरों का नगर कहा जाता था और यहां की गणेश प्रतिमा इसकी समृद्धि का प्रमाण माना जाता है.
बस्तर और ढोलकल गणेश: बस्तर अंचल में गणेश प्रतिमाओं की भरमार है. यहां लगभग हर गांव और घाटी में गणेश प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं. इनमें सबसे प्रसिद्ध है ढोलकल गणेश प्रतिमा. यह प्रतिमा घने जंगल और पहाड़ी की चोटी पर स्थित है. कठिन रास्तों और प्राकृतिक चुनौतियों के बावजूद यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. ढोलकल की गणेश प्रतिमा छत्तीसगढ़ की आस्था का प्रतीक है.
गणेश पूजा की परंपरा का संदेश: प्रसिद्ध पुरातत्वविद जे.आर. भगत बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में गणेश प्रतिमाओं की परंपरा 5वीं शताब्दी से लेकर 13वीं शताब्दी तक निरंतर रही है. इन प्रतिमाओं से यह स्पष्ट होता है कि गणेश पूजा यहां के समाज और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है. ताला की आस गणेश प्रतिमा से लेकर ढोलकल गणेश तक हर प्रतिमा अपने आप में खास महत्व रखती है. हर प्रतिमा अलग कालखंड और राजवंश की झलक पेश करती है. कला, संस्कृति और आस्था का यह संगम छत्तीसगढ़ को विशिष्ट पहचान देता है.
छत्तीसगढ़ की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर: छत्तीसगढ़ की गणेश प्रतिमाएं केवल धार्मिक प्रतीक नहीं , बल्कि यह प्रदेश की समृद्ध ऐतिहासिक धरोहर भी हैं. इनसे यह संदेश मिलता है कि छत्तीसगढ़ में गणेश पूजा की परंपरा अनादि काल से चली आ रही है और आज भी उतनी ही आस्था और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रही है.





