विश्व रेबीज दिवस: सुकमा में एंटी रेबीज जागरुकता अभियान, डॉगी को लगाए गए टीके

सुकमा: पालतू पशुओं और कुत्तों को लेकर सुकमा में सीआरपीएफ 74वीं बटालियन की तरफ से एक मानवीय पहल पेश की गई. विश्व रेबीज़ दिवस के अवसर पर दोरनापाल रेस्ट हाउस प्रांगण में निःशुल्क एंटी रेबीज टीकाकरण एवं पशु स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया. इस शिविर में लोगों को रेबीज बीमारी के प्रति जागरुक किया गया. सीआरपीएफ 74वीं बटालियन के कमांडेंट हिमांशु पांडे के निर्देश पर यह शिविर आयोजित किया गया. इस अवसर पर सीआरपीएफ के अधिकारी चंद्रशेखर सिंह, कमलेश मीणा और बड़ी संख्या में जवान मौजूद रहे.
कुत्तों को लगाए गए एंटी रेबीज टीके: इस शिविर में ग्रामीणों द्वारा लाए गए 25 कुत्तों का निःशुल्क एंटी रेबीज टीकाकरण किया गया, वहीं 37 अन्य पालतू पशुओं का इलाज कर उन्हें आवश्यक दवाइयां उपलब्ध कराई गईं. शिविर में मौजूद डॉक्टरों ने ग्रामीणों को रेबीज जैसी घातक बीमारी के बारे में जानकारी भी दी और बचाव के उपाय समझाए. पशुओं को होने वाली बीमारियां जैसे कि खुजली और वर्म से जुड़ी बीमारी का इलाज किया गया. डॉक्टर मनीष सिंह और डॉक्टर नम्रता वाहने ने इस कैंप को लीड किया.
रेबीज एक खतरनाक और लाइलाज बीमारी है, जो सामान्यतः संक्रमित कुत्तों के काटने से फैलती है. इसके शुरुआती लक्षण देर से सामने आते हैं, इसलिए बचाव ही इसका एकमात्र उपाय है. पालतू कुत्तों का नियमित वार्षिक टीकाकरण करना अत्यंत आवश्यक है- नम्रता वाहने, डॉक्टर, सीआरपीएफ 74वीं बटालियन
शिविर में भारी संख्या में पहुंचे ग्रामीण: शिविर में स्थानीय ग्रामीणों की भी अच्छी भागीदारी रही. ग्रामीणों ने बताया कि इस तरह के शिविर न केवल उनके पालतू पशुओं को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि उन्हें स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी भी प्रदान करते हैं.
स्थानीय लोगों ने की सराहना: स्थानीय लोगों ने इस आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि सीआरपीएफ न केवल उन्हें नक्सलियों के भय से सुरक्षित रख रही है, बल्कि उनके पालतू जानवरों और स्वास्थ्य की देखभाल में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है. इस शिविर ने ग्रामीणों के बीच सुरक्षा बलों और जनता के बीच आपसी विश्वास को और मजबूत किया.
बदल रहा नक्सलगढ़: नक्सल प्रभावित इलाकों में अक्सर स्वास्थ्य सेवाओं की कमी महसूस की जाती है. ग्रामीण क्षेत्रों में पशु चिकित्सक और आवश्यक दवाइयां उपलब्ध कराना कठिन रहता है. ऐसे में सीआरपीएफ द्वारा आयोजित इस तरह की पहल ग्रामीणों के जीवन में उम्मीद और विश्वास जगाती है. यह केवल सुरक्षा बलों की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रति मानवीय संवेदनाओं को भी दर्शाती है.





