February 24, 2026 4:11 pm
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उत्तरप्रदेश

महाभारत काल से चली आ रही परंपरा: हापुड़ के तिगरी मेले में नम आंखों से अपनों के लिए किया गया दीपदान

Kartik Purnima 2025: उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के गढ़मुक्तेश्वर में महाभारत काल से दीपदान की प्रथा चली आ रही है. लाखों लोग अपने दिवंगतों की आत्मा की शांति के लिए हापुड़ के गढ़ गंगा नदी में कार्तिक पूर्णिमा गंगा स्नान से एक दिन पूर्व दीपदान करने दूर-दूर से यहां पहुचते हैं. ये लोग अपने सगे संबंधी, जो स्वर्ग सिधार गए हैं, उनकी याद में गंगा किनारे दीपदान करते हैं.

इस परंपरा को निभाते समय गढ़ गंगा घाट ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे आकाश से तारे धरती पर उतर आए हों. दीयों की रोशनी से गंगा घाट जगमगा उठा. अलग-अलग राज्यों से लाखों श्रद्धालु गढ़ गंगा में स्नान कर अपने दिवंगत परिजनों के नाम से दीपदान करने आए, जिन्होंने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए गढ़ गंगा में दीपदान किया.

जानें क्या है दीपदान की मान्यता

बता दें कि महाभारत के युद्ध में मारे गए हजारों सैनिक और असंख्य योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की मौजूदगी में सर्वप्रथम चतुर्दशी को दीपदान किया था, तब से यह परंपरा चली आ रही है. वर्तमान में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इस गंगा के मेले को राजकीय दर्जा भी प्रदान कर दिया है.

दीपदान करते समय नम हुईं आंखें

बीते मंगलवार की शाम को हजारों की संख्या में श्रद्धालु दीपदान के लिए घाट पर पहुंच गए थे. सूर्यास्त होते ही दीपदान का सिलसिला शुरू हो गया और देर रात तक दीपदान जारी रहा. उसके बाद धार्मिक अनुष्ठान करते हुए पिंडदान किया गया. अपनों के बीच से बिछड़ गए लोगों की याद में दीपदान करते वक्त कुछ लोगों आंखें भर आईं.

गंगा घाटों पर किए गए थे विशेष इंतजाम

दीयों की रोशनी में गंगा घाट की छटा देखते ही बन रही थी. घाट पर ही पिंडदान की सामग्री मिल रही थी. ब्रजघाट पर दीपदान को श्रद्धालु उमड़ पड़े थे. इसको देखते हुए गंगा घाटों पर विशेष इंतजाम रहे. इन घाटों पर दीपदान की सामग्री लेकर ब्राह्मण मौजूद रहे. पूजा की सामग्री में पिंडदान, दीप, लौंग, बताशे, बांस की चटाई आदि सामग्री गंगा घाटों पर मौजूद थी. काफी श्रद्धालु अपने घरों से दीपक और घी आदि लेकर गंगा घाट पर पहुंचे थे.

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