March 11, 2026 7:41 pm
ब्रेकिंग
हरियाणा के सरकारी स्कूलों की चमकेगी किस्मत! हर स्कूल को मिलेंगे ₹2-2 करोड़; HCS अधिकारी लेंगे गोद, ज... Yamunanagar: युवती ने भगवान श्रीकृष्ण को बनाया अपना पति, धूमधाम से संपन्न हुई शादी की रस्में; यमुनान... हरियाणा के बुजुर्गों की बल्ले-बल्ले! अब ट्रेन से मुफ्त में करें अयोध्या और वैष्णो देवी के दर्शन; सरक... सावधान! हरियाणा में प्लॉट खरीदने से पहले ये खबर जरूर पढ़ लें; सरकार ने रजिस्ट्री के नियमों में किया ... Cyber Fraud Alert: इंस्टाग्राम विज्ञापन के जरिए कनाडा भेजने के नाम पर बड़ी धोखाधड़ी, कजाकिस्तान में ... मेघालय में फिल्मी अंदाज में आरोपी को छुड़ाने की कोशिश! पुलिस की फायरिंग में एक युवक को लगी गोली; इला... अंबाला के ढाबों पर मंडराया संकट! कमर्शियल सिलेंडर की किल्लत से चूल्हे ठंडे; संचालकों की सरकार से गुह... Charkhi Dadri Crime: पत्नी की हत्या कर पति ने की आत्महत्या, कुल्हाड़ी से वार कर उतारा मौत के घाट; चर... Rewari Crime News: रेवाड़ी में शादी समारोह के दौरान भारी बवाल, बनवारे में विवाद के बाद दो पक्षों में... Haryana Weather Update: हरियाणा के 15 जिलों में बारिश और ओलावृष्टि की चेतावनी, पश्चिमी विक्षोभ से बद...
झारखण्ड

CBSE स्कूलों में अब गूंजेगी मातृभाषा! जनजातीय भाषाओं को कोर्स में शामिल करने की बड़ी तैयारी; जानें बच्चों को कैसे होगा फायदा

रांची: झारखंड में जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और विकास को लेकर राज्य सरकार और शिक्षाविद लगातार प्रयास कर रहे हैं. नई शिक्षा नीति के तहत स्कूल स्तर पर मातृभाषा में पढ़ाई को बढ़ावा देने की दिशा में कई पहल की जा रही हैं. इसी क्रम में अब यह प्रयास भी तेज हुआ है कि झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जाए.

राज्य में पहले से ही झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) से संचालित सरकारी स्कूलों में जनजातीय भाषाओं से जुड़ी पढ़ाई कराई जा रही है. इसके तहत पलाश बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य प्राथमिक स्तर पर बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा देना है, ताकि सीखने की प्रक्रिया सरल और प्रभावी बन सके.

यूनिसेफ और लैंग्वेज लर्निंग फाउंडेशन भी कर रहे मदद

झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद (JEPC) के माध्यम से संचालित इस कार्यक्रम में यूनिसेफ और लैंग्वेज लर्निंग फाउंडेशन (LLF) का तकनीकी सहयोग भी लिया जा रहा है. मातृभाषा आधारित शिक्षा के जरिए बच्चों की समझ, आत्मविश्वास और कक्षा में भागीदारी को बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. पलाश योजना के तहत कक्षा 1 से 3 तक के बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाने की व्यवस्था की गई है. इसमें नागपुरी, संताली, कुड़ुख, मुंडारी और हो जैसी स्थानीय भाषाओं को शामिल किया गया है.

शिक्षा विशेषज्ञ हरि उरांव का मानना है कि शुरुआती कक्षाओं में मातृभाषा में पढ़ाई होने से बच्चों को विषयों को समझने में आसानी होती है और वे पढ़ाई के प्रति अधिक रुचि दिखाते हैं. यह कार्यक्रम वर्ष 2022 में शुरू किया गया था और फिलहाल राज्य के कई जनजातीय बहुल जिलों में लागू किया गया है. इनमें सिमडेगा, गुमला, खूंटी, लोहरदगा, लातेहार, दुमका, साहिबगंज और पश्चिमी सिंहभूम जैसे जिले शामिल हैं. इन जिलों के सरकारी स्कूलों में बच्चों के लिए स्थानीय भाषाओं में विशेष कार्यपुस्तिकाएं और शिक्षण सामग्री तैयार की गई है.

प्रशिक्षित शिक्षक होना जरूरी

योजना के तहत शिक्षकों को भी बहुभाषी शिक्षण पद्धति के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है, जिससे कक्षाएं अधिक संवादात्मक और बाल-केंद्रित बन सकें. इसके साथ ही कई स्कूलों में ‘राइट टू स्पीक’ जैसे कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य बच्चों की पढ़ने और समझने की क्षमता को बेहतर बनाना है.

सीबीएसई में पहल शुरू

इधर, झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए भी पहल शुरू हो गई है. इस दिशा में जनजातीय भाषा विभाग के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में सीबीएसई बोर्ड के अधिकारियों से मुलाकात कर एक मेमोरेंडम सौंपा है.

रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में नागपुरी के शिक्षक डॉ वीरेंद्र कुमार महतो का कहना है कि झारखंड में नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई स्कूल और कॉलेजों में हो रही है, लेकिन इसे और बेहतर तरीके से लागू करने की जरूरत है. उन्होंने बताया कि सीबीएसई बोर्ड में भी झारखंड की भाषाओं को शामिल करने के लिए भाषाविद लगातार प्रयास कर रहे हैं. इस संबंध में दिल्ली में सीबीएसई बोर्ड के डायरेक्टर से बातचीत की गई है. अब रांची में सीबीएसई का क्षेत्रीय कार्यालय खुलने के बाद इस दिशा में और सार्थक प्रयास होने की उम्मीद है.

वहीं, रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्रोफेसर डॉ. बंदे उरांव का कहना है कि जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार लगातार काम कर रही है. उनका मानना है कि यदि सरकार, शिक्षण संस्थानों और समाज का सामूहिक प्रयास जारी रहा तो आने वाले समय में इन भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में मजबूत स्थान मिल सकता है.

झारखंड गठन के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं. इस दौरान जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में शामिल करने की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं, लेकिन अभी भी इसे व्यापक स्तर पर लागू करने की जरूरत महसूस की जा रही है. नई शिक्षा नीति भी प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने पर जोर देती है.

ऐसे में स्कूलों में मातृभाषा में पढ़ाई और सीबीएसई बोर्ड में झारखंड की भाषाओं को शामिल करने की पहल को जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

Related Articles

Back to top button