UP Politics: यूपी में राज्यसभा की 10 सीटों का सियासी गणित, 8 वोटों की खातिर क्या फिर होगी क्रॉस वोटिंग?
उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना तय हुआ है। मौजूदा दलीय स्थिति के अनुसार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) 7 सीटों पर और समाजवादी पार्टी (सपा) 2 सीटों पर सहज रूप से जीत दर्ज करने की स्थिति में हैं। हालांकि, असली सियासी घमासान अब 10वीं सीट को लेकर छिड़ गया है।
सूत्रों के मुताबिक, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने 10वीं सीट पर भी अपना प्रत्याशी उतारने का मन बना लिया है। इस तीसरी सीट के लिए पार्टी में कई प्रमुख नामों की चर्चा चल रही है, जिनमें पश्चिमी यूपी के गुर्जर नेता चौधरी रूद्रसेन, पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम शेरवानी और पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद सिंह गोप के नाम प्रमुखता से शामिल हैं।
सपा ने अपनी दो सुरक्षित सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा पहले ही कर दी है। पार्टी विधायकों की बैठक में प्रोफेसर रामगोपाल यादव और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन के नाम पर मुहर लगा दी गई है। वहीं, तीसरी सीट के दावेदारों के समक्ष अखिलेश यादव ने दो टूक शर्त रखी है कि जो नेता आवश्यक अतिरिक्त वोट और दूसरे दलों के विधायकों से समर्थन जुटाने का सामर्थ्य रखता हो, पार्टी उसी पर दांव लगाएगी।
📊 क्या है यूपी विधानसभा में राज्यसभा का संख्या बल? जानिए जीत का जादुई आंकड़ा
विधानसभा की प्रभावी संख्या और प्रथम वरीयता मत:
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प्रभावी सदस्य संख्या: उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं, जिनमें से वर्तमान में 6 सीटें रिक्त हैं। इस प्रकार सदन की प्रभावी सदस्य संख्या 397 है।
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जीत का कोटा: 397 सदस्यों के आधार पर 10 सीटों के चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी को जीत हासिल करने के लिए कम से कम 37 प्रथम वरीयता (First Preference) वोटों की आवश्यकता होगी।
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एनडीए की कुल ताकत: विधानसभा में बीजेपी के अपने 256 विधायक हैं। सहयोगी दलों (अपना दल एस, निषाद पार्टी, रालोद, सुभासपा) को मिलाकर एनडीए का आंकड़ा 292 तक पहुंचता है।
🎯 बीजेपी के पक्ष में मजबूत आंकड़े: आठवीं सीट के लिए चाहिए महज 2 अतिरिक्त वोट
सत्तारूढ़ गठबंधन का गणित:
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निर्दलीय समर्थन: जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के 2 विधायकों के समर्थन के साथ एनडीए का आंकड़ा 294 तक पहुंच जाता है।
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7 सीटों पर आसान जीत: 37 के कोटे के हिसाब से बीजेपी गठबंधन 259 वोटों के बल पर 7 सीटें निर्विरोध जैसी स्थिति में जीत सकता है।
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आठवीं सीट की चुनौती: 8 सीटों के लिए कुल 296 वोटों की दरकार होगी। 294 के संख्या बल के साथ एनडीए को आठवीं सीट सुरक्षित करने के लिए मात्र 2 अतिरिक्त मतों की आवश्यकता है। पिछली बार सपा के 4 विधायकों द्वारा की गई क्रॉस वोटिंग को देखते हुए बीजेपी का पलड़ा काफी भारी नजर आ रहा है।
⚖️ सपा-कांग्रेस गठबंधन का समीकरण: 29 अतिरिक्त वोटों के बाद 8 मतों की दरकार
विपक्षी खेमे की जमीनी स्थिति:
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सपा गठबंधन की संख्या: विधानसभा में समाजवादी पार्टी के पास 101 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के 2 विधायक उनके साथ खड़े हैं। इस तरह विपक्षी ब्लॉक के पास 103 वोट मौजूद हैं।
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दो सीटों के बाद बचे वोट: दो प्रत्याशियों (रामगोपाल यादव और आलोक रंजन) को जिताने के लिए 74 वोटों की जरूरत होगी। इसके बाद सपा के पास 29 अतिरिक्त वोट शेष बचेंगे।
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तीसरी सीट के लिए चुनौती: तीसरे प्रत्याशी को जिताने के लिए सपा को न्यूनतम 37 वोटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचना होगा, जिसके लिए पार्टी को 8 अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की दरकार होगी।
🔍 कहां से आएंगे 8 अतिरिक्त वोट? क्रॉस वोटिंग रोकने और साधने की दोहरी चुनौती
सियासी जोड़-तोड़ की संभावना:
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अपनों को एकजुट रखना: सपा के सामने अपने विधायकों को एकजुट रखने के साथ-साथ पिछले चुनाव में बागी हुए विधायकों की नाराजगी दूर करने की बड़ी चुनौती है।
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अन्य दलों में सेंधमारी: राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि रालोद (RLD) के 3 और सुभासपा (SBSP) के 4 विधायक सपा नेतृत्व के संपर्क में हैं।
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दावेदारों पर दारोमदार: अखिलेश यादव ने स्पष्ट संदेश दिया है कि जो भी नेता अपने संपर्कों के जरिए इन 8 अतिरिक्त मतों का प्रबंध करेगा, पार्टी उसे ही 10वीं सीट का अधिकृत उम्मीदवार बनाएगी।
👤 दावेदारों की रेस में सलीम शेरवानी सबसे आगे: मुस्लिम चेहरे पर दांव की तैयारी
पूर्व केंद्रीय मंत्री का प्रोफाइल:
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लंबा संसदीय अनुभव: पांच बार सांसद रहे सलीम शेरवानी केंद्र में इंद्र कुमार गुजराल सरकार के दौरान मंत्री रह चुके हैं और पार्टी के वरिष्ठ मुस्लिम चेहरों में गिने जाते हैं।
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पुरानी नाराजगी की भरपाई: पिछले लोकसभा चुनाव में बदायूं सीट से टिकट न मिलने के बाद वे नाराज चल रहे थे, जिन्हें बाद में सपा नेतृत्व ने मना लिया था। ऐसे में राज्यसभा भेजकर पार्टी संतुलन साध सकती है।
🌾 गुर्जर नेता चौधरी रूद्रसेन के नाम पर भी विचार: पश्चिमी यूपी को साधने की रणनीति
चौधरी यशपाल सिंह की विरासत:
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मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता रहे स्वर्गीय चौधरी यशपाल सिंह के बेटे चौधरी रूद्रसेन संगठन में राष्ट्रीय महासचिव का दायित्व संभाल रहे हैं।
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जातीय समीकरण: सहारनपुर जिला अध्यक्ष रह चुके रूद्रसेन के जरिए सपा पश्चिमी यूपी के गुर्जर मतदाताओं के बीच अपनी पैठ मजबूत करने का प्रयास कर सकती है।
⚡ अरविंद सिंह गोप का नाम चौंकाने वाला: बागी और क्षत्रिय विधायकों में मजबूत पकड़
पूर्व मंत्री की दावेदारी के मजबूत पहलू:
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अखिलेश के करीबी रणनीतिकार: सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे अरविंद सिंह गोप की गिनती अखिलेश यादव के सबसे विश्वस्त सहयोगियों में होती है।
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अन्य दलों से बेहतर संबंध: अरविंद सिंह गोप के रघुराज प्रताप सिंह (राजा भैया) की पार्टी के साथ मधुर संबंध बताए जाते हैं। साथ ही बागी चल रहे क्षत्रिय विधायकों में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है, जिससे वे 8 अतिरिक्त वोटों की भरपाई करने में सक्षम साबित हो सकते हैं।
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