मुंबई: महाराष्ट्र के बहुचर्चित एंटीलिया बम धमकी और उससे जुड़े मामलों में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक कड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व विवादित पुलिस अधिकारी सचिन वाझे की जमानत को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया है। जस्टिस गिरीश कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ ने नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) की ओर से दायर की गई अपील को स्वीकार करते हुए निचली विशेष अदालत के उस आदेश को पलट दिया है, जिसमें वाझे को जमानत दी गई थी।
29 सितंबर को विशेष अदालत से मिली थी जमानत, एनआईए की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनाया फैसला
गुरुवार को बॉम्बे हाई कोर्ट ने उस जमानत आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जो बीते 29 सितंबर को एक विशेष अदालत द्वारा सचिन वाझे के पक्ष में पारित किया गया था। इस फैसले के खिलाफ राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान, एजेंसी की तरफ से पैरवी करते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने जोरदार दलील दी कि निचली अदालत का वह जमानत आदेश कानून की नजर में पूरी तरह गलत और त्रुटिपूर्ण था।
‘सुपरकॉप’ के रूप में अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा और छवि वापस पाना चाहता था वाझे, उद्योगपति के घर के बाहर खड़ी की थी जिलेटिन से भरी एसयूवी
सुनवाई के दौरान एनआईए की ओर से अदालत को बताया गया कि इस मामले में एंटीलिया की सुरक्षा में तैनात कर्मचारियों के विस्तृत बयान दर्ज किए जा चुके हैं। केंद्रीय एजेंसी का सीधा आरोप है कि आरोपी सचिन वाझे ने ही उद्योगपति मुकेश अंबानी के आवास के बाहर जिलेटिन की छड़ों से भरी एक संदिग्ध एसयूवी (SUV) गाड़ी खड़ी की थी। एजेंसी के अनुसार, इस पूरी साजिश का मुख्य उद्देश्य जबरन वसूली करना और समाज में एक गहरी आतंकी सनसनी फैलाना था। वाझे का मुख्य मकसद खुद ही इस हाई-प्रोटिफाइल मामले को “सुलझाकर” मीडिया और पुलिस विभाग के भीतर एक “सुपरकॉप” के रूप में अपनी साहसी छवि को फिर से स्थापित करना था।
मनसुख हिरेन की हत्या का भी है आरोप, बचाव पक्ष के वकील ने यूएपीए (UAPA) की धाराओं को लेकर दी अपनी दलील
एनआईए ने अदालत के समक्ष यह भी गंभीर आरोप लगाया कि जब इस पूरी साजिश से जुड़ी गाड़ी के मूल मालिक मनसुख हिरेन ने इस आपराधिक कृत्य की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया, तो उसकी निर्मम हत्या कर दी गई। वहीं दूसरी ओर, आरोपी सचिन वाझे की पैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट वीएम थोराट ने एनआईए के इन तमाम तर्कों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि यदि जांच एजेंसी की पूरी कहानी को सच भी मान लिया जाए, तो भी केवल अपनी खोई हुई सामाजिक प्रतिष्ठा और नौकरी की गरिमा वापस पाने के लिए डर का माहौल पैदा करना, ‘अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट’ यानी UAPA की धारा 15 के दायरे में एक “आतंकी कृत्य” के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता।
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