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पुरुषोत्तम योग: श्रीकृष्ण ने 15वें अध्याय में क्या कहा? PM मोदी ने उडुपी में किया इसका जिक्र, जानें क्या है जीवात्मा का सनातन स्वरूप

 पीएम नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के उडुपी में ऐतिहासिक श्री कृष्ण मठ में आयोजित आज’लक्ष कंठ गीता पारायण’ कार्यक्रम में भाग लिया. यह कार्यक्रम न केवल एक धार्मिक समागम था, बल्कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक एकता की एक विशाल अभिव्यक्ति थी, जिसमें लगभग एक लाख लोगों ने एक साथ श्रीमद्भगवद् गीता का पाठ किया. इस विशेष अवसर पर, प्रधानमंत्री मोदी ने सभा को संबोधित करते हुए श्रीमद्भगवद् गीता के 15वें अध्याय (पुरुषोत्तम योग) के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि किस प्रकार गीता के ये शाश्वत संदेश न केवल व्यक्तिगत जीवन को दिशा देते हैं, बल्कि राष्ट्र की नीतियों और “सबका साथ, सबका विकास” जैसे सिद्धांतों का भी आधार बनते हैं.

श्रीकृष्ण ने 15वें अध्याय ‘पुरुषोत्तम योग’ में क्या कहा?

भगवद् गीता के 15वें अध्याय को ‘पुरुषोत्तम योग’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘उत्तम पुरुष का योग’ या ‘परम पुरुष की प्राप्ति’. यह अध्याय भगवान श्रीकृष्ण के परम स्वरूप, आत्मा और संसार के स्वरूप को बहुत ही गूढ़ और सरल तरीके से समझाता है.

संसार वृक्ष का वर्णन

श्रीकृष्ण इस अध्याय की शुरुआत संसार को एक उल्टे पीपल के वृक्ष (अश्वत्थ वृक्ष) के रूप में बताते हुए करते हैं.

उल्टा वृक्ष: जिसकी जड़ें ऊपर (परमेश्वर) हैं और शाखाएं नीचे (संसार). यह दर्शाता है कि संसार का मूल परमेश्वर में है.

अनासक्ति का शस्त्र: श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार रूपी दृढ़ मूल वाले वृक्ष को ज्ञान और वैराग्य रूपी शस्त्र से ही काटा जा सकता है.

परम पद की प्राप्ति: इस वृक्ष को काटकर, साधक को उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहां जाने के बाद कोई वापस नहीं आता.

जीवात्मा का स्वरूप

भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि जीवात्मा (मनुष्य की आत्मा) उन्हीं का सनातन अंश है.

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः. यानी इस संसार में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है. यही जीवात्मा प्रकृति में स्थित मन और पांचों इंद्रियों को आकर्षित करता है. यह श्लोक आत्मा की अमरता, ईश्वरीय संबंध और सांसारिक बंधनों के कारण होने वाले कष्टों को दर्शाता है.

परम पुरुष (पुरुषोत्तम) का वर्णन

उत्तम पुरुष (पुरुषोत्तम): इन दोनों (क्षर और अक्षर) से परे जो परमेश्वर है, जो अविनाशी और सर्वव्यापी है, वह परमात्मा ही ‘पुरुषोत्तम’ कहलाता है. श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे ही ‘उत्तम पुरुष’ हैं, और वेद तथा लोक में भी वे ‘पुरुषोत्तम’ नाम से प्रसिद्ध हैं.

पीएम मोदी के संबोधन में 15वें अध्याय की प्रेरणा

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘लक्ष कंठ गीता पारायण’ के अवसर पर अपने भाषण में बताया कि गीता के यह शाश्वत ज्ञान, विशेषकर 15वें अध्याय के संदेश, उनकी सरकार की नीतियों का प्रेरणा स्रोत हैं.

गरीबों की सहायता का मंत्र: प्रधानमंत्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण हमें गरीबों की सहायता का मंत्र देते हैं, और इसी मंत्र की प्रेरणा से आयुष्मान भारत और पीएम आवास जैसी योजनाएं सफल हो रही हैं.

सबके कल्याण की भावना: श्री कृष्ण हमें सबके कल्याण की बात सिखाते हैं, जो भारत की वैक्सीन मैत्री, सोलर अलायंस और वसुधैव कुटुम्बकम् की नीतियों का आधार बनती है.

शांति और सुरक्षा: गीता का संदेश युद्ध की भूमि पर दिया गया था और यह सिखाता है कि शांति और सत्य की स्थापना के लिए अत्याचारियों का अंत भी आवश्यक है. प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्र की सुरक्षा नीति का मूल भाव बताया, जिसके तहत भारत ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के साथ-साथ ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ का मंत्र भी दोहराता है.

सामाजिक एकता की ऊर्जा: उन्होंने कहा कि एक लाख कंठों द्वारा एक स्वर में श्लोकों का उच्चारण एक ऐसी ऊर्जा उत्पन्न करता है जो मन और मस्तिष्क को नई शक्ति देती है. यह ऊर्जा अध्यात्म की शक्ति है और सामाजिक एकता की शक्ति भी है.

अमृतकाल से कर्तव्यकाल की ओर

प्रधानमंत्री मोदी का उडुपी में 15वें अध्याय का उल्लेख करना यह दर्शाता है कि भारत की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत उसके आधुनिक शासन और लोक कल्याणकारी नीतियों का मार्गदर्शक सिद्धांत है. ‘पुरुषोत्तम योग’ का संदेश हमें क्षणभंगुर संसार से ऊपर उठकर परम सत्य को जानने और निस्वार्थ भाव से कर्म करने की प्रेरणा देता है. पीएम मोदी ने इस दौरान जोर दिया कि विकसित भारत के निर्माण के लिए प्रत्येक व्यक्ति और संस्था को अपने कर्तव्यों का योगदान देना होगा. यह गीता के निष्काम कर्म के सिद्धांत के अनुरूप है.

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