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Medical Colleges in CG: मेडिकल कॉलेजों में शिक्षकों और डॉक्टरों के आधे से ज्यादा पद रिक्त; बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर बड़ा सवाल

रायपुर: छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है। एक ओर सरकार डॉक्टरों की कमी का रोना रोती है, वहीं दूसरी ओर राज्य मेडिकल काउंसिल में 17,142 डॉक्टर पंजीकृत हैं। इनमें 11 हजार से ज्यादा एमबीबीएस और 5 हजार विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं। इसके बावजूद, सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है, जिसका सीधा खामियाजा प्रदेश की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

👨‍⚕️ मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी का गंभीर संकट

राज्य के मेडिकल कॉलेजों की स्थिति सबसे अधिक दयनीय है। यहाँ न केवल मरीजों के लिए स्टाफ की कमी है, बल्कि भविष्य के डॉक्टर तैयार करने वाले शिक्षकों के पद भी खाली पड़े हैं:

  • सीनियर रेजिडेंट: 72.3% पद खाली।

  • असिस्टेंट प्रोफेसर: 51.6% पद रिक्त।

  • एसोसिएट प्रोफेसर: 49.1% पद खाली।

  • प्रोफेसर: 48.5% पद रिक्त।

🩺 विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी

प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 1773 स्वीकृत पदों में से मात्र 355 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। सुकमा और मोहला-मानपुर जैसे जिलों में तो विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या शून्य है। इस स्टाफ संकट के कारण राज्य का सरकारी स्वास्थ्य ढांचा इतना कमजोर हो गया है कि आज तक छत्तीसगढ़ में एक भी किडनी, लीवर या हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं हो सका है।

📉 बॉण्ड नीति और पलायन का दर्द

युवा डॉक्टरों का कहना है कि राज्य की कठोर ‘बॉण्ड नीति’ (एमबीबीएस के लिए 25 लाख और एमडी-एमएस के लिए 50 लाख का बॉण्ड) और अत्यंत कम मानदेय के कारण वे निजी क्षेत्र या अन्य राज्यों का रुख कर रहे हैं। इंटर्न डॉक्टरों को मात्र 530 रुपये प्रतिदिन का मानदेय मिलता है, जो कि देशभर में सबसे कम है। इसी वजह से प्रतिभाशाली डॉक्टर जुर्माना भरकर भी छत्तीसगढ़ छोड़ने को मजबूर हैं।

📢 सिविल सोसायटी की कड़ी चेतावनी

छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने मुख्य सचिव को 16 पन्नों का विस्तृत पत्र भेजकर तत्काल नियमित भर्ती करने, बॉण्ड नीति में संशोधन और मानदेय बढ़ाने की मांग की है। सोसायटी का सवाल स्पष्ट है—जब राज्य में 17 हजार डॉक्टर उपलब्ध हैं, तो फिर सरकारी व्यवस्था में ये रिक्तियां क्यों? आखिर यह डॉक्टरों की कमी है या फिर भर्ती नीति की पूर्ण विफलता?

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