अमृतसर में खतरनाक स्तर पर पहुंचा प्रदूषण, स्वास्थ्य विभाग ने जारी की एडवाइजरी— सांस के मरीजों के लिए चेतावनी
अमृतसर: पवित्र गुरु नगरी अमृतसर में लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा वायु प्रदूषण और जहरीली धुंध (स्मॉग) आम जनता के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। हवा में मौजूद अत्यधिक सूक्ष्म प्रदूषण कण सांस के मार्ग से सीधे फेफड़ों तक पहुंचकर श्वसन तंत्र को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। इस स्थिति के चलते दमा, ब्रोंकाइटिस, गंभीर एलर्जी, हृदय रोग और सांस से जुड़ी अन्य पुरानी बीमारियों से पीड़ित मरीजों की मुश्किलें बढ़ने की आशंका है। बिगड़ते हालातों को देखते हुए स्थानीय स्वास्थ्य विभाग ने जिलावासियों के लिए एक विशेष एडवाइजरी जारी की है और लोगों से प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों से बचने के लिए आवश्यक सावधानियां अपनाने की अपील की है।
सिविल सर्जन डॉ. भारती धवन की सलाह, सुबह-शाम बाहर निकलने से बचें और बाहर जाते समय एन-95 मास्क का करें इस्तेमाल
जिला सिविल सर्जन डॉ. भारती धवन ने जानकारी देते हुए बताया कि इस जहरीले वायु प्रदूषण का सबसे गंभीर प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से ही श्वसन या दिल की बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर पड़ता है। प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता कमजोर हो सकती है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, लगातार खांसी, गले में खराश और आंखों में जलन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि जब हवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो, तब विशेषकर सुबह और शाम के समय अनावश्यक रूप से घरों से बाहर निकलने से परहेज किया जाए। घर से बाहर जाते वक्त एन-95 या इसी स्तर का प्रभावी मास्क जरूर पहनें, क्योंकि साधारण कपड़े के मास्क, रुमाल या दुपट्टे से प्रदूषण के बेहद सूक्ष्म कणों से पूरी सुरक्षा नहीं मिलती है। इसके अलावा, घरों के भीतर हवा के आवागमन का उचित प्रबंध रखने के साथ-साथ फर्श की सफाई के लिए सूखे झाड़ू की बजाय हमेशा गीले पोछे का उपयोग करना चाहिए।
स्कूल प्रबंधन बच्चों की बाहरी गतिविधियां करें सीमित, आग से बचाव और आंखों की सुरक्षा के लिए बताए जरूरी उपाय
डॉ. धवन ने स्थानीय स्कूल प्रबंधकों से भी पुरजोर अपील की है कि वे रोजाना एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) की ताजा जानकारी प्रदर्शित करें और प्रदूषण का स्तर अधिक होने वाले दिनों में बच्चों की बाहरी खेलकूद तथा अन्य शारीरिक गतिविधियों को सीमित रखें। दमा या सांस की अन्य समस्याओं से पीड़ित स्कूली बच्चों के लिए विशेष एहतियात बरतने की जरूरत है। त्योहारी सीजन के मद्देनजर पटाखों से होने वाले हादसों से बचाव की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि यदि किसी व्यक्ति के कपड़ों में अचानक आग लग जाए, तो उसे तुरंत जमीन पर लेटकर इधर-उधर लुढ़ककर आग बुझाने का प्रयास करना चाहिए। इसके अलावा, शरीर के जले हुए हिस्से को कम से कम 20 मिनट तक साफ और ठंडे बहते पानी के नीचे रखना चाहिए, तथा जले हुए स्थान पर कभी भी बर्फ, टूथपेस्ट, घी या तेल जैसी चीजें नहीं लगानी चाहिए। यदि आंख में किसी प्रकार की चोट लग जाए, तो उसे भूलकर भी रगड़ना नहीं चाहिए और तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचना चाहिए।
सांस लेने में तकलीफ या छाती में जकड़न होने पर तुरंत लें चिकित्सीय सलाह, आपात स्थिति के लिए जारी किए गए हेल्पलाइन नंबर
उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई, लगातार खांसी, सांस लेते समय घरघराहट की आवाज, छाती में दर्द या भारीपन, चक्कर आना और आंखों में तेज जलन या लालिमा जैसे लक्षण महसूस हों, तो बिना किसी देरी के नजदीकी डॉक्टर या स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करना चाहिए। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे व्यक्तिगत वाहनों के बजाय सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें और अधिक से अधिक पौधे लगाकर पर्यावरण में प्रदूषण का स्तर घटाने में अपना सहयोग दें। किसी भी आपात स्थिति या मेडिकल इमरजेंसी के दौरान एंबुलेंस सेवा के लिए ‘108’ और अन्य पुलिस सहायता के लिए ‘112’ नंबर पर संपर्क किया जा सकता है।
टी.बी. और दमा के पुराने मरीज बरतें अतिरिक्त सतर्कता, नियमित रूप से दवाइयां लेते रहें और डॉक्टर के संपर्क में रहें
जिला टी.बी. अधिकारी डॉ. विजय गोतवाल ने विषय पर विस्तार से बताते हुए कहा कि वायु प्रदूषण का सीधा और घातक असर हमारे फेफड़ों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। विशेष रूप से टी.बी., दमा और सांस की अन्य पुरानी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को इस मौसम में बहुत अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है। प्रदूषित हवा में तैर रहे सूक्ष्म कण सांस के जरिए भीतर जाकर फेफड़ों में सूजन पैदा कर सकते हैं और सांस संबंधी पुरानी तकलीफों को और अधिक गंभीर बना सकते हैं। उन्होंने सभी मरीजों को सलाह दी कि वे अपनी दवाइयां समय पर नियमित रूप से लेते रहें, बिना डॉक्टर की सलाह के अपनी कोई भी दवा बंद न करें और प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर घर से बाहर निकलने से पूरी तरह परहेज करें। लगातार खांसी, बलगम आने, सांस फूलने या सीने में दर्द की शिकायत होने पर तुरंत अपनी चिकित्सीय जांच करवाएं।
2.5 पी.एम. और 10 पी.एम. के बारीक कण पहुंचा सकते हैं भारी नुकसान, बच्चों और बुजुर्गों को भारी कसरत से बचने की सलाह
सरकारी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर तुषार बांसल ने तकनीकी पहलू समझाते हुए बताया कि हवा में मौजूद 2.5 पी.एम. और 10 पी.एम. जैसे अति सूक्ष्म प्रदूषण कण सांस के रास्ते सीधे फेफड़ों के भीतरी हिस्सों तक पहुंच जाते हैं। इनमें 2.5 पी.एम. के कण सबसे अधिक खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि वे फेफड़ों की गहरी परतों में समाकर सूजन उत्पन्न करते हैं। इससे दमे के दौरे पड़ने की आशंका बढ़ जाती है, सांस की नलियां संकरी हो जाती हैं और फेफड़ों की कार्यक्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। उन्होंने विशेष रूप से बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को अत्यधिक प्रदूषित माहौल में दौड़ने, कसरत करने या कोई भी भारी शारीरिक मेहनत करने से बचने की सख्त सलाह दी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सांस लेने में होने वाली हल्की सी भी तकलीफ को मामूली समझकर कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश चावला की चेतावनी, प्रदूषित हवा स्वस्थ व्यक्तियों में भी पैदा कर सकती है सांस की गंभीर समस्याएं
जाने-माने छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. नरेश चावला ने चेतावनी देते हुए कहा कि वायु प्रदूषण के कारण सांस की नलियों में लगातार जलन और सूजन की स्थिति बन सकती है, जिससे दमा, सी.ओ.पी.डी. और ब्रोंकाइटिस के पुराने मरीजों की तकलीफें कई गुना बढ़ जाती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि कई बार पूरी तरह से स्वस्थ व्यक्तियों को भी लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने के कारण खांसी, गले में खराश, सांस फूलने और छाती में भारीपन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि सुबह की सैर या खुले मैदानों में कसरत करने घर से निकलने से पहले हमेशा उस दिन की हवा की गुणवत्ता (AQI) की जांच अवश्य कर लें। जब भी प्रदूषण का स्तर ज्यादा बढ़ा हुआ हो, तो खुले में जाने के बजाय घर के अंदर रहकर ही हल्की-फुल्की कसरत करना बेहतर विकल्प है। यदि सांस लेने में किसी भी प्रकार की गंभीर समस्या उत्पन्न हो, तो तुरंत अस्पताल पहुंचकर विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।
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