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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, वैवाहिक विवाद मामले में पति की मां और बहन को दी राहत— आपराधिक कार्यवाही रद्द

रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए पति की मां (सास) और बहन (ननद) को बहुत बड़ी राहत प्रदान की है। न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने बहू को ससुराल में प्रवेश करने से रोकने और उसके साथ अपमानजनक व्यवहार करने के आरोपों के मद्देनजर दोनों महिलाओं के खिलाफ निचली अदालत में चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। अदालत ने अपने इस फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि शिकायतकर्ता के सभी आरोपों को सत्य भी मान लिया जाए, तब भी संबंधित आरोपियों के विरुद्ध संज्ञेय अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व स्थापित नहीं होते हैं, ऐसी स्थिति में उनके खिलाफ मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग माना जाएगा। यह पूरा कानूनी मामला रांची जिले के नामकुम थाना क्षेत्र के लोवाडीह स्थित हरिजन बस्ती तथा लोहरदगा जिले के महिला थाने से संबंधित है।

लोहरदगा महिला थाने में दर्ज की गई थी प्राथमिकी, मुख्य आरोप पति और एक अन्य महिला पर लगाए गए थे

प्राप्त विवरण के अनुसार, इस मामले में लोहरदगा महिला थाना कांड संख्या 23/2024 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी, जो बाद में जीआर संख्या 311/2025 के रूप में न्यायिक प्रक्रिया के अधीन चल रही थी। शिकायतकर्ता महिला ने अपने पति के अलावा अपनी सास उर्सिला टोप्पो और ननद सविता सोनी टोप्पो को भी आरोपी बनाया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सास और ननद ने उसे लोवाडीह स्थित उसके वैवाहिक घर (ससुराल) के अंदर प्रवेश नहीं करने दिया और उसके साथ अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। हालांकि, गंभीर किस्म के आरोप जैसे कि मारपीट करना और दहेज की मांग करना मुख्य रूप से केवल पति के ऊपर ही लगाए गए थे।

भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत तय किए गए थे आरोप, याचिकाकर्ताओं ने खटखटायोग हाईकोर्ट का दरवाजा

पुलिस द्वारा की गई शुरुआती जांच के पश्चात दोनों महिलाओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 85, 115(2), 126(2), 352 और 351(2) के अंतर्गत चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। इसके बाद लोहरदगा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने 21 अगस्त 2025 को इन धाराओं के तहत संज्ञान लिया, और फिर 10 अगस्त 2026 को दोनों के खिलाफ आरोप (चार्जेस) तय कर दिए गए। निचली अदालत के इस आदेश से राहत पाने के लिए दोनों महिलाओं ने झारखंड हाईकोर्ट में क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन संख्या 942/2026 दाखिल की थी, जिसके माध्यम से पूरी आपराधिक कार्यवाही और निचली अदालत के आदेशों को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने की आरोपों की समीक्षा, पाया कि मारपीट और धमकी देने जैसी धाराओं के आवश्यक तत्व सास-ननद के मामले में नहीं बनते

जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने मामले के सभी दस्तावेजों और आरोपों की अलग-अलग समीक्षा करते हुए पाया कि शिकायतकर्ता के साथ मारपीट करने का मुख्य आरोप केवल उसके पति पर था। सास और ननद पर किसी भी प्रकार की शारीरिक चोट पहुंचाने या मारपीट करने का कोई भी आरोप नहीं लगाया गया था। इसी प्रकार, जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी एक अन्य महिला के खिलाफ था, न कि इन दोनों याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों महिलाओं के खिलाफ BNS की धारा 115(2) और 351(2) के कानूनी रूप से जरूरी तत्व ही सिद्ध नहीं होते हैं, इसलिए इन धाराओं के तहत आरोप गठित करना एक गंभीर कानूनी त्रुटि है।

घर में प्रवेश से रोकने के आरोपों को धारा 85 के तहत अपर्याप्त माना, केवल अपमान करने को धारा 352 के दायरे से बाहर बताया

BNS की धारा 85 के संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस अपराध के गठन के लिए महिला के साथ ऐसी क्रूरता का होना आवश्यक है जिससे वह आत्महत्या करने के लिए विवश हो जाए अथवा उसके जीवन, शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुंचने का वास्तविक खतरा हो। इसके अलावा दहेज जैसी गैरकानूनी मांगें पूरी कराने के लिए प्रताड़ित करने के तत्व भी होने चाहिए। अदालत ने पाया कि सास-ननद पर केवल घर में न आने देने और अपमानित करने का ही आरोप है, जो इस धारा के दायरे में नहीं आता। वहीं, BNS की धारा 352 पर कोर्ट ने कहा कि केवल अपमानित करना इस धारा के तहत अपराध नहीं बनता, जब तक कि उस अपमान का उद्देश्य पीड़ित को शांति भंग करने या अन्य अपराध के लिए उकसाना न हो।

कानूनी पहलुओं पर विचार के बाद हाईकोर्ट ने दोनों महिलाओं के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को किया निरस्त

समस्त तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों पर विस्तार से विचार करने के उपरांत न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी ने यह निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता के तमाम आरोपों को सही मान लेने के बावजूद सास और ननद के विरुद्ध किसी भी सुसंगत धारा के तहत अपराध का मामला नहीं बनता है। नतीजतन, उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने लोहरदगा महिला थाना कांड संख्या 23/2024 से जुड़ी समस्त आपराधिक कार्यवाही, 21 अगस्त 2025 के संज्ञान आदेश तथा 10 अगस्त 2026 के आरोप गठन के आदेश को दोनों याचिकाकर्ताओं (सास और ननद) के संदर्भ में पूरी तरह से रद्द कर दिया है।

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