श्योपुर: एक तरफ जहां पूरा देश रोशनी के पावन पर्व दीपावली का जश्न मना रहा है, वहीं मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले के भीतर एक ऐसा भी सुदूर आदिवासी गांव मौजूद है जो आज भी अंधेरे के साये में जीने के लिए अभिशप्त है। श्योपुर जिले के कराहल विकासखंड के अंतर्गत आने वाले कुरचोर खुर्द गांव में देश की आजादी के इतने लंबे वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक बिजली नहीं पहुंच पाई है। दीपावली जैसे बड़े और महत्वपूर्ण त्यौहार के अवसर पर इन ग्रामीणों का पुराना दर्द एक बार फिर सतह पर आ गया है।
बिजली के दर्शन को तरसे ग्रामीण, पानी के लिए महिलाओं को रोजाना ढाई किलोमीटर घाटी उतरकर सिर पर बर्तन ढोने की है मजबूरी
गांव के निवासियों का कहना है कि वे बिजली के दर्शन करने को भी तरस चुके हैं। स्थिति इतनी दयनीय है कि गांव में पेयजल के लिए भी कोई उचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। पीने का पानी लाने के लिए महिलाओं को अपनी जान जोखिम में डालकर घाटी से नीचे उतरकर करीब ढाई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। इसके बाद वे सिर पर पानी से भरे बर्तन रखकर वापस घाटी चढ़कर अपने घरों तक पहुंचती हैं, तब जाकर उनके घर की प्यास बुझ पाती है।
केवल चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं जनप्रतिनिधि और अधिकारी, वादे करने के बाद कोई पलटकर नहीं देखता
श्योपुर जिले के बिल्कुल अंतिम छोर पर बसे कुरचोर खुर्द गांव में बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के लिए समय-समय पर तमाम जनप्रतिनिधियों ने बड़े-बड़े वादे तो किए, लेकिन चुनाव का वक्त बीत जाने के बाद वे कभी भी इस सुदूर इलाके में लौटकर नहीं आए। स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी इन समस्याओं को लेकर कई बार जिला मुख्यालय तक की दौड़ लगाई और अधिकारियों से मिलकर बिजली-पानी की सुविधा मुहैया कराने की गुहार लगाई, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।
लगातार आवेदन देकर थक चुके हैं ग्रामीण, आगोनी लाल और श्रेसी बाई ने बयां किया अपना गहरा दर्द
ग्रामीण आगोनी लाल आदिवासी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि “गांव के हालात बेहद खराब हैं और लोग किसी तरह बमुश्किल अपना समय काट रहे हैं। पीने के पानी का कोई स्थायी इंतजाम नहीं है, जिसके कारण हम सभी को रोजाना खतरनाक घाटी उतरकर पानी लाना पड़ता है। बिजली का भी कोई नामो-निशान नहीं है। प्रशासन के सामने कई बार अपनी समस्या रखी, मगर आज तक किसी ने सुध नहीं ली।” वहीं श्रेसी बाई ने बताया कि गांव में न तो बिजली है और न ही पानी की कोई सुविधा। उन्होंने कई बार लिखित आवेदन दिए और अधिकारियों को अपनी परेशानी बताई, लेकिन कहीं से भी कोई समाधान हाथ नहीं लगा।
अंधेरे और मच्छरों के प्रकोप के बीच बच्चों की पढ़ाई हो रही है प्रभावित, बीरबल आदिवासी और युवा राजाराम ने रखी अपनी बात
एक अन्य ग्रामीण बीरबल आदिवासी ने बताया कि “हमारे गांव में पानी का संकट आजादी के समय से ही लगातार बना हुआ है। ग्रामीण बेहद नरकीय और मुश्किल परिस्थितियों में जीवन गुजारने को मजबूर हैं। बिजली न होने के कारण हमारे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर भी बहुत बुरा असर पड़ रहा है। रात होते ही पूरे गांव में घना अंधेरा छा जाता है और जहरीले मच्छरों का भारी प्रकोप शुरू हो जाता है। पूर्व में जिले के कलेक्टर भी गांव आ चुके हैं और उन्हें भी सभी समस्याओं से अवगत कराया गया था, लेकिन इसके बावजूद आज तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला।” गांव के युवा राजाराम ने बताया कि पानी की किल्लत के कारण उन्हें हर रोज भारी संघर्ष करना पड़ता है।
प्रशासन की ओर से आया बयान, कराहल एसडीएम विजय शाक्य ने कहा— सीईओ से ली गई है जांच रिपोर्ट, जो भी संभव होगा की जाएगी कार्रवाई
इस पूरे गंभीर मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कराहल के अनुविभागीय अधिकारी (SDM) विजय शाक्य ने कहा है कि “इस संबंध में जनपद पंचायत के सीईओ से विस्तृत जांच रिपोर्ट प्राप्त कर ली गई है। ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के लिए जो भी प्रशासनिक कार्रवाई उचित होगी, उसे जल्द से जल्द अमल में लाया जाएगा।”
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