धनबाद कोलियरी रिश्वतकांड: 1993 के ₹300 घूस मामले में हाईकोर्ट ने माना मानवीय आधार, जेल में बिताई अवधि को ही माना पूरी सजा
रांची (झारखंड): झारखंड हाईकोर्ट ने तीन दशक से अधिक पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए धनबाद के वासुदेवपुर कोलियरी के तत्कालीन भविष्य निधि (PF) क्लर्क समीर कुमार चौधरी को बड़ी राहत दी है।
अदालत ने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) द्वारा सुनाई गई 2 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को घटाकर केवल एक माह एक दिन (31 दिन) कर दिया है। यह वही समयावधि है जो अभियुक्त पहले ही न्यायिक हिरासत में काट चुके हैं। हाईकोर्ट ने मामले के 33 वर्षों के लंबे अंतराल, अभियुक्त के बेदाग आपराधिक इतिहास और मानवीय दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए यह फैसला दिया।
⛏️ मार्च 1993 का मामला: CMPF भुगतान के बदले 300 रुपये घूस मांगने का था आरोप
मामले की पृष्ठभूमि और CBI की कार्रवाई:
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घटना की शुरुआत: यह प्रकरण मार्च 1993 का है, जब समीर कुमार चौधरी धनबाद स्थित वासुदेवपुर कोलियरी में पीएफ क्लर्क के पद पर पदस्थ थे।
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रिश्वत की मांग: आरोप के अनुसार, उन्होंने उसी कोलियरी के पूर्व माइनर लोडर रामधनी हरिजन से उनके लंबित कोयला खान भविष्य निधि (CMPF) एरिया भुगतान के क्लेम को आगे बढ़ाने के एवज में ₹300 की रिश्वत मांगी थी।
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सीबीआई का ट्रैप: पीड़ित की शिकायत पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने जाल बिछाकर आरोपी को कथित रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा था और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोग दर्ज किया था।
⏳ 12 साल बाद ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी 2 वर्ष की कठोर कैद
निचली अदालत का निर्णय और हाईकोर्ट में अपील:
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ट्रायल कोर्ट का फैसला: लंबी कानूनी प्रक्रिया के उपरांत फरवरी 2005 (करीब 12 वर्ष बाद) में सीबीआई की विशेष अदालत ने आरोपी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए 2 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
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हाईकोर्ट में अपील: इस फैसले के विरुद्ध समीर कुमार चौधरी ने झारखंड हाईकोर्ट में अपील याचिका दायर की, जहां सुनवाई में पुनः दो दशक का लंबा समय बीत गया।
🏛️ 33 साल के लंबे मुकदमे और साफ रिकॉर्ड को हाईकोर्ट ने माना आधार
जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की पीठ के मुख्य निष्कर्ष:
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लंबी कानूनी प्रक्रिया: हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रदीप श्रीवास्तव की एकल पीठ ने पाया कि घटना वर्ष 1993 की है और अभियुक्त विगत 33 वर्षों से निरंतर न्यायिक प्रक्रिया व मानसिक तनाव का सामना कर रहा है।
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पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं: अदालत ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि आरोपी का पूर्व में कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है।
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मानवीय आधार पर फैसला: अदालत ने परिस्थितियों और मामले की अत्यधिक लंबी अवधि को देखते हुए सजा में नरमी बरतना न्यायोचित माना।
🛡️ जेल में बिताई अवधि ही मानी गई पूरी सजा, अतिरिक्त जेल जाने से मिली मुक्ति
फैसले का अंतिम प्रभाव:
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सजा में संशोधन: हाईकोर्ट द्वारा सजा घटाकर एक माह एक दिन किए जाने के बाद अब अभियुक्त को पुनः जेल नहीं जाना पड़ेगा, क्योंकि यह अवधि वे पूर्व में ही काट चुके हैं।
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विधिक सिद्धांत: यह आदेश इस विधिक सिद्धांत को पुनर्स्थापित करता है कि मुकदमे की सुनवाई में असाधारण विलंब और अभियुक्त का स्वच्छ आचरण सजा के निर्धारण में मानवीय आधार पर विचारणीय तत्व होते हैं।
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