RIMS Ranchi News: रिम्स के डॉक्टरों की दरियादिली से बचा छात्रा का डॉक्टर बनने का सपना, देर रात खुलवाया कॉलेज कार्यालय और कराया बीडीएस में एडमिशन
रांची: झारखंड की राजधानी रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) के डेंटल इंस्टीट्यूट में मानवता और कर्तव्यनिष्ठा की एक बेहद प्रेरणादायक मिसाल देखने को मिली है। बीडीएस (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए अंतिम तारीख की शाम करीब छह बजे लोहरदगा की रहने वाली एक मेधावी युवती कविता रिम्स परिसर में पहुंचीं। वहां पहुंचने पर उसने मुख्य द्वार पर तैनात सुरक्षा गार्ड को बताया कि उसे बीडीएस कोर्स में एडमिशन लेना है। हालांकि, गार्ड ने सामान्य प्रक्रिया के तहत उसे अगले दिन आने की सलाह दी, लेकिन उसे यह बिल्कुल अंदेशा नहीं था कि उस दिन ही नामांकन की अंतिम तिथि थी और सभी प्रक्रियाएं पूरी कर पोर्टल पर फॉर्म अपलोड करना अनिवार्य था। गार्ड से बातचीत के बाद निराश होकर कविता अपने घर लौटने के लिए रास्ते में निकल पड़ी, लेकिन तभी वह वाक्या उस सुरक्षा गार्ड ने एडमिशन इंचार्ज डॉ. विष्णुपति सिंह तक पहुंचा दिया।
देवदूत बने रिम्स के डॉक्टर, बंद कार्यालय को देर रात खुलवाकर कराया नामांकन
इसके बाद रिम्स के अंडर-ग्रजुएट एडमिशन सेल से जुड़े चिकित्सकों ने जो मानवीय कदम उठाया, उसकी प्रशंसा आज हर कोई कर रहा है। रिम्स के डॉक्टरों की संवेदनशीलता के कारण लोहरदगा की रहने वाली कविता की वर्षों की कड़ी मेहनत बर्बाद होने से बाल-बाल बच गई। जब कविता अपने घर के रास्ते में थी, तभी उसके फोन पर एक कॉल आया और उसे तुरंत वापस रिम्स पहुंचने के लिए कहा गया। अधिकारियों के निर्देश पर बंद हो चुका प्रशासनिक कार्यालय देर रात में दोबारा खोला गया और छात्रा के बीडीएस कोर्स में एडमिशन की तमाम कागजी प्रक्रियाएं पूरी की गईं। यदि उस रात कविता का नामांकन नहीं हो पाता, तो न केवल उसका एक कीमती शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होता, बल्कि नियमों के अनुसार वह अगले वर्ष होने वाली नीट परीक्षा देने की पात्रता भी हमेशा के लिए खो बैठती।
अंतिम समय में आवंटन पत्र मिलने के बाद शाम ढले कॉलेज पहुंची थी छात्रा
लोहरदगा निवासी छात्रा कविता को बीडीएस पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए कॉलेज आवंटन पत्र ठीक प्रवेश की अंतिम तिथि की शाम को प्राप्त हुआ था। आवंटन पत्र हाथ में आते ही वह बिना देर किए शाम छह बजे के बाद रिम्स डेंटल कॉलेज जा पहुंची। उस वक्त तक कॉलेज कार्यालय का निर्धारित कामकाज का समय शाम पांच बजे तक ही था, जिसके कारण मुख्य कार्यालय पूरी तरह बंद हो चुका था। ऐसी विषम और विकट परिस्थिति में डॉक्टर सुभाष चंद्र, डॉक्टर बिष्णुपति सिंह, डॉक्टर शांताल नाइक और डॉक्टर अभय जैन के साथ-साथ लिपिकीय कर्मचारी रंजन सिंह ने अपनी उच्च कर्तव्यनिष्ठा और गहरी मानवीय संवेदना का परिचय देते हुए देर रात तक कॉलेज में रुकने का फैसला किया और छात्रा के एडमिशन की जटिल प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराया।
निदेशक डॉ. डीके सिन्हा ने की पूरी टीम की सराहना, बचा छात्रा का भविष्य
रिम्स के निदेशक डॉ. डीके सिन्हा ने इस पूरी घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कार्यालय को दोबारा खुलवाकर कविता का नामांकन पूरा कराने में सहयोग देने वाले सभी डॉक्टरों और कार्यालय स्टाफ के इस कार्य की भूरी-भूरी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि उस दिन ही हर हाल में नामांकन प्रक्रिया पूरी कर डॉक्यूमेंट्स अपलोड करना बेहद जरूरी था, ऐसे में डॉक्टर विष्णुपति सिंह और अन्य चिकित्सकों ने वाकई काबिलेतारीफ काम किया है। निदेशक ने बताया कि कविता के बीडीएस कोर्स में प्रवेश से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेजों का गहनता से सत्यापन किया गया, प्रवेश की तमाम औपचारिकताएं पूरी की गईं और अंततः सभी आवश्यक कागजातों को ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड कर एडमिशन की प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया।
समय पर मदद मिलने से एक मेधावी छात्रा का डॉक्टर बनने का सपना हुआ साकार
संस्थान के निदेशक ने इस बात पर जोर दिया कि यदि अंतिम तिथि को किसी कारणवश कविता का प्रवेश नहीं हो पाता, तो निर्धारित सख्त प्रवेश नियमों के चलते उसे अगले वर्ष की नीट-यूजी परीक्षा में बैठने की पात्रता खोने जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ता। इससे उसके पूरे शैक्षणिक भविष्य और चिकित्सा के क्षेत्र में एक सफल डॉक्टर बनने के सपने पर बहुत बुरा असर पड़ सकता था। कॉलेज के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारी रंजन सिंह के इस संवेदनशीलता से भरे प्रयास के कारण ही उस मेधावी छात्रा का प्रवेश सुरक्षित हो सका और उसका भविष्य बर्बाद होने से बच गया। यह पूरी घटना यह साबित करती है कि यदि शैक्षणिक संस्थानों में प्रशासनिक दायरे में रहते हुए भी मानवीय दृष्टिकोण और समय पर सही प्रयास किए जाएं, तो वह किसी भी विद्यार्थी के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल सकता है।
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