Jharkhand High Court Landmark Judgment: ट्रेन से टिकट न मिलने पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं कर सकता रेलवे, हाईकोर्ट ने दिए 8 लाख देने के आदेश
रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने ट्रेन दुर्घटना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी यात्री की चलती ट्रेन से गिरकर मौत हो जाती है और उसके पास से रेलवे टिकट बरामद नहीं होता है, तो केवल इस तकनीकी आधार पर उसके परिजनों के मुआवजे के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता है। अदालत ने अपने इस फैसले में रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसमें मृतक यात्री के आश्रितों की मुआवजा याचिका को खारिज कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने मृतक के परिजनों को कुल 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश पारित किया है, जिस पर आवेदन दाखिल करने की तिथि से लेकर भुगतान होने तक 6 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज भी देय होगा। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल तकनीकी कमियों या साक्ष्यों की अनदेखी कर मुआवजे से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।
ट्रिब्यूनल के फैसले को बैजंती गोप ने दी थी चुनौती, न्यायमूर्ति संजय कुमार अदालत ने सुनाया न्याय
यह अहम फैसला झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत द्वारा एमए संख्या 449/2023 में सुनाया गया है। अदालत ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची के 12 सितंबर 2023 के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसके तहत अपील खारिज की गई थी। इस कानूनी लड़ाई को लड़ने वाली याचिकाकर्ता में मृतक की पत्नी बैजंती गोप, उनकी माता जेमा गोदिन और दो नाबालिग बच्चे शामिल थे, जिनकी तरफ से रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे की मांग की गई थी। इस मामले में प्रतिवादी के रूप में दक्षिण पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक के माध्यम से भारत संघ को पक्षकार बनाया गया था।
वर्ष 2017 की दुर्घटना का मामला, झींकपानी से यात्रा के दौरान धक्का-मुक्की में ट्रेन से नीचे गिरे थे यात्री
प्रकरण के विवरण के अनुसार, यह मामला पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बनमाली गोप की आकस्मिक मृत्यु से जुड़ा हुआ है। परिजनों ने अदालत को जानकारी दी थी कि 1 सितंबर 2017 को बनमाली गोप झींकपानी रेलवे स्टेशन से केंडपोसी जाने के लिए टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए थे। उनके भाई हरीश गोप ने स्टेशन पर उन्हें छोड़ने के साथ ही उनकी यात्रा के लिए विधिवत टिकट भी खरीदा था। यात्रा के दौरान ट्रेन के डिब्बे में भारी भीड़ थी, और बनमाली गोप अंदर खड़े होकर सफर कर रहे थे। जैसे ही ट्रेन केंडपोसी स्टेशन के करीब पहुंची, तो यात्रियों की भारी आवाजाही और धक्का-मुक्की के बीच ट्रेन को एक तेज झटका लगा, जिससे उनका संतुलन बिगड़ गया और वे चलती ट्रेन से नीचे आ गिरे। इस भीषण दुर्घटना में उन्हें गंभीर चोटें आईं और मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी।
टिकट न मिलने और गवाह की अनुपस्थिति का हवाला देकर रेलवे ने किया था मुआवजे का विरोध
अदालत में सुनवाई के दौरान रेलवे की ओर से ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश का पुरजोर बचाव किया गया। रेलवे के अधिवक्ता का तर्क था कि चूंकि मृतक के शव के पास से कोई टिकट नहीं मिला था और साथ यात्रा करने वाले कैलाश गोप ने ट्रिब्यूनल में गवाही नहीं दी थी, इसलिए उन्हें वैध यात्री नहीं माना जा सकता। इसके अलावा घटना के समय और शव मिलने के समय में अंतर का भी हवाला दिया गया। दूसरी ओर, मृतक के परिजनों की पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने दलील दी कि भाई हरीश गोप ने स्पष्ट रूप से गवाही दी थी कि उन्होंने टिकट खरीदा था। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे यह साबित करने में विफल रहा कि यह मामला मुआवजे से छूट की श्रेणियों में आता है, और ट्रिब्यूनल ने अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया था।
कानूनी प्रावधानों के तहत 8 लाख रुपये मुआवजा और ब्याज भुगतान के निर्देश
झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए और इससे संबंधित मुआवजा प्रावधानों का हवाला देते हुए मृतक के परिजनों को 8 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान करने का निर्देश दिया है। अदालत के स्पष्ट आदेश के अनुसार इस राशि पर आवेदन की तारीख से गणना करते हुए 6% की दर से वार्षिक ब्याज भी मिलेगा। इस फैसले से दिवंगत यात्री के परिवार को बड़ी राहत मिली है।
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