Khajuraho Jawari Temple News: छतरपुर के 11वीं सदी के जवारी मंदिर में फिर जुड़ेगा भगवान विष्णु की मूर्ति का सिर, ASI को मिला खंडित हिस्सा
खजुराहो (छतरपुर): मध्य प्रदेश के विश्वविख्यात पयर्टन केंद्र खजुराहो से भारतीय वास्तुकला और धरोहर प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। यहाँ स्थित 11वीं सदी के प्राचीन और ऐतिहासिक जवारी मंदिर में भगवान विष्णु की एक भव्य बिना सिर वाली प्रतिमा स्थापित है, जो पिछले लंबे समय से खंडित अवस्था में थी। राहत की बात यह है कि अब इस सात फीट ऊंची प्रतिमा का गायब हुआ सिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के मुख्य भंडार से बरामद कर लिया गया है। इस दुर्लभ प्रतिमा के सिर की वैज्ञानिक जाँच-परख पूरी होने के बाद अब मंदिर के भीतर खंडित मूर्ति को उसके मूल रूप में वापस जोड़ने की विधिवत तैयारियां जोर-शोर से शुरू कर दी गई हैं। संबंधित विशेषज्ञों द्वारा यह प्रबल संभावना जताई जा रही है कि इसी आगामी नवंबर माह के भीतर इस ऐतिहासिक कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया जाएगा।
चंदेल राजाओं द्वारा 11वीं शताब्दी में कराया गया था जवारी मंदिर का निर्माण, गर्भगृह में स्थापित है बलुआ पत्थर की सात फीट ऊंची प्रतिमा
खजुराहो के इस प्राचीन जावरी (जवारी) मंदिर में अब भगवान विष्णु की इस पवित्र प्रतिमा को उसका मूल और अखंड स्वरूप वापस मिलने की आस पूरी होती नजर आ रही है। ‘मूर्ति संरक्षित फाउंडेशन’ के चेयरमैन राकेश दलाल पिछले काफी लंबे समय से इस ऐतिहासिक प्रतिमा के उचित संरक्षण और उसके गायब सिर को पुन: उसके धड़ पर स्थापित करवाने के लिए एक लंबा और संघर्षपूर्ण अभियान चला रहे थे। आपको बता दें कि जवारी मंदिर भारतीय वास्तुकला और चंदेलकालीन मंदिर निर्माण कला का एक बेहद उत्कृष्ट व जीवंत उदाहरण है, जिसका निर्माण आज से सदियों पहले 11वीं शताब्दी के दौरान किया गया था। इस मंदिर के पावन गर्भगृह के भीतर बलुआ पत्थर से तराशकर भगवान विष्णु की लगभग सात फीट ऊंची इस मनमोहक प्रतिमा को स्थापित किया गया था। हालांकि, समय के थपेड़ों के बीच इस मूर्ति का धड़, उनकी चारों भुजाएं और पैर तो सुरक्षित रूप से मौजूद थे, परंतु इसका सिर बरसों से गायब चल रहा था, जो अब आखिरकार खजुराहो स्थित एएसआई (ASI) के सुरक्षित भंडार से खोज निकाला गया है।
पुरानी तस्वीरों और वैज्ञानिक संरचना के आधार पर हुई सिर की पहचान, फाउंडेशन के संघर्ष रंग लाए
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि मंदिर की पुरानी और ऐतिहासिक तस्वीरों का मिलान करके इस सिर की प्रामाणिकता की पहचान की गई है। इस पहचान के मुख्य आधार के रूप में पत्थर की रासायनिक संरचना, उसका रंग, शारीरिक अनुपात तथा भगवान विष्णु के मुकुट की बेहद बारीक और अद्भुत नक्काशी को बनाया गया था। इस पूरे अभियान की अगुवाई करने वाले मूर्ति संरक्षित फाउंडेशन के चेयरमैन राकेश दलाल ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि “भगवान विष्णु की इस प्राचीन प्रतिमा का असली सिर एएसआई के भंडार में सफलतापूर्वक मिल चुका है, और अब इसे पुन: धड़ से जोड़ने की कानूनी व तकनीकी प्रक्रिया आरंभ की जा चुकी है।” उन्होंने यह भी बताया कि इस मुकाम तक पहुँचने के लिए उन्हें और उनकी टीम को एक लंबी और कठिन कानूनी व सामाजिक लड़ाई लड़नी पड़ी है। इस जायज मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर पुरजोर तरीके से उठाया गया, जिसके तहत दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन किया गया, देश के केंद्रीय गृह मंत्री को आधिकारिक ज्ञापन सौंपा गया और खजुराहो की धरती पर विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से आम जनमानस को जागरूक करने का कार्य किया गया।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुँची थी कानूनी लड़ाई, कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर ‘एक दीप, एक संकल्प’ अभियान चलाने की है योजना
राकेश दलाल ने आगे बताया कि इस बहुमूल्य प्रतिमा के समुचित संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए उनका फाउंडेशन सितंबर 2025 में देश के सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) तक भी जा पहुँचा था, जहाँ एक जनहित याचिका दायर कर भगवान विष्णु की इस खंडित प्रतिमा के पूर्ण पुनरुद्धार और उसके मूल स्वरूप की बहाली की मांग की गई थी। अब एएसआई के भंडार से सिर मिल जाने के बाद राकेश दलाल ने इस संरक्षण कार्य में अपनी ओर से हरसंभव सहयोग देने की पहल की है। आगामी 24 नवंबर 2026 को आने वाले पवित्र कार्तिक पूर्णिमा के विशेष पर्व के अवसर पर ‘एक दीप, एक संकल्प’ नामक एक अनूठे अभियान के तहत जवारी मंदिर परिसर में विशेष दीप प्रज्वलित करने की औपचारिक अनुमति भी मांगी गई है। इस पूरे आयोजन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के नागरिकों और पर्यटकों को भगवान विष्णु की इस ऐतिहासिक प्रतिमा के संरक्षण और सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूक करना है।
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